
समुद्र में चीन को घेरने की भारत की रणनीति
विनय कौड़ा, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ
भारत ने पानी के भीतर युद्धक क्षमता और ताकत बढ़ाने के उद्देश्य से छह अत्याधुनिक परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण का फैसला किया है। योजना पर 43,000 करोड़ रुपए की लागत आएगी। नई परमाणु पनडुब्बियां एयर-इंडिपेंडेंट प्रप्लशन से लैस होंगी, जो लम्बे समय तक पानी के भीतर रहने और उनकी लड़ाकू क्षमता बढ़ाने में सहायक होगी। भारत के इस कदम के पीछे चीन की बढ़ती आक्रामकता और हठधर्मिता सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। चीन की बढ़ती नौसैनिक ताकत, हिन्द महासागर में उसकी सैन्य मौजदूगी भारत की मुख्य चिन्ता है। चीन के अप्रत्याशित इरादों के बीच बदलती वैश्विक व्यवस्था ने भी यूएस को अमरीकी बलों की विदेशों में तैनाती में निर्णायक परिवर्तन के लिए प्रेरित किया। शीतयुद्ध में अमरीकी बलों की बड़े पैमाने पर तैनाती मुख्यत: यूरोप, विशेषकर जर्मनी में केन्द्रित थी। 9/11 के आतंकी हमलों के बाद अमरीका ने अपनी प्राथमिकताओं को मध्यपूर्व में स्थानान्तरित करना प्रारम्भ कर दिया। अब यूएस ओवरसीज फोर्स का बड़ा हिस्सा हिन्द-प्रशान्त क्षेत्र में केन्द्रित हो रहा है।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन द्वारा अपने बंदरगाह और सैन्य ठिकाने बढ़ाने के मद्देनजर बड़ी वैश्विक शक्तियों के बीच यह मुद्दा चर्चा का विषय है। अविश्वास के मौजूदा माहौल ने बड़े एशियाई देशों के सैन्य बजट को भी प्रभावित किया है। यद्यपि चीन ने अपने बलों की संख्या में कटौती की है, लेकिन फाइटर जेट, मिसाइल, क्रूजर और परमाणु पनडुब्बी में काफी इजाफा किया है। भारत के संदर्भ में, चीन ने लद्दाख क्षेत्र में संघर्षपूर्ण हालात पैदा किए हैं। सेना हटाने में वह भारत के साथ कोई सहयोग नहीं कर रहा है। इसी तरह से वह दक्षिण चीन समुद्र में अपनी ताकत बढ़ा रहा है। एशिया में सैन्य संतुलन बनाए रखने के लिए यूएस के पास क्षेत्र में सक्रिय होने के अलावा अन्य विकल्प नहीं है। चूंकि, यह काम अकेले नहीं हो सकता, इसलिए अमरीका ने कुछ चुनिन्दा सहयोगियों के साथ मेलजोल किया है।
चतुर्भुज सुरक्षा संवाद अर्थात क्वाड (यूएस, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत के बीच अनौपचारिक रणनीतिक वार्ता मंच) को चीन के बढ़ते समुद्री दावों से मुकाबले में ताकतवर मंच के रूप में देखा जाता है। जापान, क्वाड एकता का प्रमुख सरपरस्त है। चीन के कारण क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल बदलने से जापान ने हाल में अपने रक्षा खर्च पर एक फीसदी जीडीपी सीमा को खत्म करने का फैसला किया है। यही वजह है कि चीन क्वाड को अपनी बढ़ती आर्थिक और सैन्य ताकत का जवाबी गठबंधन मानता है।
भारत के सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने स्पष्ट किया है कि कुछ देश क्वाड को सैन्य गठबंधन कहकर अनावश्यक भय उत्पन्न कर रहे हैं। मार्च में क्वाड के पहले शिखर सम्मेलन में चुनौतियों से निपटने में सहयोग को मजबूत करने का संकल्प लिया गया है, जो सैन्य क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। शिखर सम्मेलन में वैक्सीन सहयोग, पर्यावरण और प्रौद्योगिकी पर भी विचार-विमर्श हुआ। पड़ोसी देशों को वैक्सीन आपूर्ति रोकने वाला भारत का फैसला जल्द ही भू-राजनीतिक समीकरण बदल सकता है। इससे वैक्सीन कूटनीति को बढ़ावा देने की चीन को गुंजाइश मिल गई है। दक्षिण एशिया और हिंद-प्रशांत के कुछ देश चीनी वैक्सीन को अपना सकते हैं। ऐसे में कोविड-19 के प्रबंधन में क्वाड में भारत के सहयोगियों को इन देशों की मदद करना चाहिए। कुछ पहल जोर भी पकडऩे लगी हैं। पिछले सप्ताह अमरीकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने भारत समेत अन्य देशों को 8 करोड़ वैक्सीन देने की जानकारी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अवगत कराया। आने वाले महीनों में बहुत कुछ करना होगा। कोविड संकट के लिए अमरीका की सुदृढ़ प्रतिक्रिया क्वाड की विश्वसनीयता बढ़ाने में मील का पत्थर होगी।
Published on:
08 Jun 2021 08:44 am
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