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India-US Trade Deal 2026: संरक्षणवादी रुख कायम, भारत को रहना होगा सतर्क

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एक तरफ कहा कि भारत टैरिफ देगा, अमरीका नहीं; वहीं दूसरी ओर यह भी कहा कि भारत-अमरीका ट्रेड डील में कोई बदलाव नहीं होगा। ऐसा लग रहा है कि ट्रंप अपने बयान से भारत पर और भी अधिक दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

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जयपुर

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Opinion Desk

Feb 23, 2026

India US Trade Deal 2026

ट्रंप अपने बयान से भारत पर और भी अधिक दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

राहुल लाल,

अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा 1977 के कानून 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (आइईईपीए) के तहत लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ को असंवैधानिक घोषित कर एक बड़ा झटका दिया, लेकिन ट्रंप ने तुरंत प्रतिक्रिया में अमरीकी ट्रेड एक्ट-1974 के सेक्शन 122 का उपयोग करते हुए 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ की घोषणा कर दी, जिसे शनिवार देर रात को बढ़ाकर 15 प्रतिशत तक कर दिया गया। भारत को किसी प्रकार की छूट नहीं दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत के साथ हुई ट्रेड डील पर क्या असर पड़ेगा, के सवाल का जवाब देते हुए ट्रंप ने कहा, 'कुछ भी नहीं बदला है। भारत टैरिफ का भुगतान करेगा, हम टैरिफ का भुगतान नहीं करेंगे।' यह नीतिगत बदलाव वैश्विक व्यापार व्यवस्था को गहरे संकट में डाल रहा है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ट्रंप के सामने भी एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। भले ही ट्रंप दूसरी कानूनी शक्तियों का प्रयोग कर टैरिफ की घोषणा कर रहे हैं, परंतु अब अमरीका में अरबों डॉलर के रिफंड को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू हो सकती है। हजारों कंपनियां और आयातक अमरीकी सरकार को चुकाए गए करीब 170 अरब डॉलर तक के टैरिफ वापस पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई शुरू करने की तैयारी में हैं। ट्रंप प्रशासन का संरक्षणवादी रुख 2016 के चुनाव से प्रारंभ हुआ था। 2018 में चीन पर लगाए गए टैरिफ ने व्यापार युद्ध की शुरुआत की।

ट्रंप ने फरवरी 2025 में आइईईपीए कानून का पहली बार उपयोग करते हुए चीन, मैक्सिको और कनाडा से आने वाले सामान पर टैरिफ लगाया। कुछ महीनों बाद ट्रंप ने 'लिबरेशन डे' की घोषणा करते हुए टैरिफ का दायरा सभी देशों पर 10 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक कर दिया। इस कदम के पीछे अमरीकी व्यापार घाटे को असाधारण खतरा बताया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ही असंवैधानिक घोषित किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नए टैरिफ लगाने की संवैधानिक शक्ति कांग्रेस (अमरीकी संसद) के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं है। साथ ही 1977 के आइईईपीए का मकसद राजस्व जुटाना नहीं है। ट्रंप की टैरिफ नीति के पीछे 'अमरीका फर्स्ट' एजेंडा है। ट्रंप का दावा है कि वे घरेलू उद्योगों को पुनजीर्वित करेंगे, परंतु इससे अमरीकी परिवारों पर प्रतिवर्ष 2,600 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। इतिहास 'स्मूट-हॉले टैरिफ' की याद दिलाता है।

1930 में यह टैरिफ वैश्विक व्यापार को 65 प्रतिशत तक कम कर चुका था। महामंदी की स्थिति इस टैरिफ से और भयावह हो गई थी। आइएमएफ का अनुमान है कि वर्तमान टैरिफ वैश्विक जीडीपी को 0.8 से 1.2 प्रतिशत घटाएंगे। एक तरफ यूक्रेन युद्ध ने ऊर्जा संकट पैदा किया, वहीं दूसरी तरफ चिप की कमी ने विनिर्माण को प्रभावित किया। जलवायु परिवर्तन ने कृषि को असुरक्षित बनाया। ऐसे में ट्रंप के टैरिफ, अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और फिर ट्रंप के जवाबी टैरिफ ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि विदेशी व्यापार अधिशेष असंतुलन पैदा कर रहे हैं। चीन और भारत जैसे देशों पर दोष मढ़ा जा रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि अमरीकी उत्पादन क्षमता अपर्याप्त है। टैरिफ से अमरीका में घरेलू कीमतें बढ़ रही हैं। इसके साथ विश्व व्यापार संगठन की प्रासंगिकता घट रही है। ट्रंप ने तो इसे 'मृत संस्था' ही कह दिया है।

15 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ विश्व व्यापार को 4 से 6 प्रतिशत संकुचित करेगा। अमरीका वैश्विक आयात का 15 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। इससे चीन का अमरीका को 500 अरब डॉलर का निर्यात प्रभावित होगा। इसी तरह यूरोपीय यूनियन का 400 अरब डॉलर का निर्यात भी खतरे में है। इससे कमॉडिटी बाजार में अस्थिरता आएगी। साथ ही विकासशील देशों पर कर्ज संकट गहराएगा। स्थानीय मुद्राएं कमजोर पड़ेंगी। इससे निवेश प्रवाह भी 25 प्रतिशत घटेगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियां सप्लाई चेन पुनर्गठन पर 1 ट्रिलियन डॉलर खर्च करेंगी, लेकिन अनिश्चितता से पूंजीगत व्यय स्थगित हो जाएगा। ट्रंप का बयान 'भारत टैरिफ देगा, अमेरिका नहीं' मूलत: भारत-अमरीका ट्रेड डील पर बहुआयामी और जटिल प्रभाव डालता है।

यह बयान अमरीका के संरक्षणवादी रुख को रेखांकित करता है। जब दोनों देश ट्रेड डील को अंतिम रूप देने का प्रयास कर रहे हैं, तब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद ट्रंप के बयान को देखते हुए भारत को सतर्क रुख अपनाने की जरूरत है। ट्रंप भारत को 'टैरिफ किंग' बताकर घरेलू समर्थन जुटा रहे हैं। ट्रेड डील में 'बाय अमरीका' नीति के तहत भारत अगले 5 वर्षों में अमरीका से 500 अरब डॉलर की खरीद करेगा। भारत-अमरीका ट्रेड डील तेजी से आगे बढ़ रही है। अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से इस ट्रेड डील को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। साथ ही ट्रंप के एकतरफा बयान ने भारतीय नीति निर्माताओं को और भी सावधान कर दिया है, जिससे वे ट्रेड डील में अपने हितों की रक्षा के लिए और भी प्रतिबद्ध हो सकें। इस ट्रेड डील पर मार्च 2026 में हस्ताक्षर होंगे और क्रियान्वयन अप्रैल से संभावित है।

ट्रंप ने एक तरफ कहा कि भारत टैरिफ देगा, अमरीका नहीं; वहीं दूसरी ओर यह भी कहा कि भारत-अमरीका ट्रेड डील में कोई बदलाव नहीं होगा। ऐसा लग रहा है कि ट्रंप अपने बयान द्वारा भारत पर और भी अधिक दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं। भारत के लिए आवश्यक है कि वह अपने कृषि, डेयरी इत्यादि क्षेत्रों का संरक्षण करते हुए अमरीका से ट्रेड डील करे। इसके साथ ही भारत को निर्यात के लिए बाजार विविधीकरण को और भी प्राथमिकता में रखना होगा। वास्तव में ट्रंप के बयान ने भारत को ट्रेड डील के फाइनल ड्राफ्ट से पहले सावधान किया है।