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आईना: नकली डिग्री, असली नौकरी, आखिर कब खुलेगा पूरा सच?

डिग्री के सहारे आखिर कितने लोग सरकारी सेवा में पहुंचे? सरकार के पास इसका स्पष्ट आंकड़ा क्यों नहीं है? जो डिग्री नकली है, उसे जब्त क्यों नहीं किया गया?

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जयपुर

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Rakesh Mishra

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विजय चौधरी

Feb 23, 2026

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फाइल फोटो- पत्रिका

एक कागज… जिस पर मुहर है, हस्ताक्षर हैं, बारकोड है। वही कागज नौकरी का दरवाजा खोल देता है, वेतन और वैधता दिला देता है, लेकिन जब जांच एजेंसियां कहती हैं कि कागज नकली है… तब क्‍या होता है? कुछ गिरफ्तारियां, कुछ निलंबन, कुछ बर्खास्तगी… और फिर एक लंबा प्रशासनिक विराम। जैसे व्यवस्था ने राहत की सांस ली हो, ‘इतना काफी है।’

राजस्थान की विधानसभा में मुद्दा गूंजा। सरकार ने स्वीकार किया… प्रदेश में 53 निजी विश्वविद्यालय हैं, जिनमें से 10 के खिलाफ जांच चल रही है। कई संचालक, रजिस्ट्रार, कार्मिक और कथित दलाल जेल भेजे जा चुके हैं। पर, सबसे बुनियादी सवाल अब भी जवाब तलाश रहा है। डिग्री के सहारे आखिर कितने लोग सरकारी सेवा में पहुंचे? सरकार के पास इसका स्पष्ट आंकड़ा क्यों नहीं है? जो डिग्री नकली है, उसे जब्त क्यों नहीं किया गया?

सरकार से जब पूछा गया…कितनी नियुक्तियां रद्द हुईं? कितनों को सेवा से पृथक किया गया? कितने परीक्षा नियंत्रकों और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई हुई? जवाब मिला… जांच जारी है। कमाल है… कभी-कभी तो लगता है कि ‘जांच जारी है’ वाक्य ही तमाम तकलीफों का एक स्थायी सुरक्षा कवच है? एसओजी को कई विश्वविद्यालयों की जांच सौंपी गई है, यदि भर्ती परीक्षाओं में बैकडेट डिग्रियों का उपयोग सिद्ध हुआ है, तो उन संदिग्ध वर्षों में जारी सभी डिग्रियों की अनिवार्य सामूहिक समीक्षा क्यों नहीं?

समस्या केवल अपराध की नहीं, राजनीतिक सुविधा की भी है। कार्रवाई दिखती है, पर उसकी सीमा तय है। सीमा सिर्फ व्यक्ति तक है। संस्थान तक पहुंचते-पहुंचते रफ्तार धीमी हो जाती है। सत्ता के चक्र के कारण आज जो कटघरे में है, कल वही जांच का दायित्व संभालेगा। निजी विश्वविद्यालयों के प्रबंधन में प्रभावशाली चेहरों की परछाइयां हमेशा ही चर्चा में रही हैं। जब शिक्षा और सत्ता एक ही गलियारे में मिलें तो फैसले अक्सर संतुलित दिखते हैं, साहसी नहीं। इसका सबसे बड़ा नुकसान किसे? उस अभ्यर्थी को, जिसने वैध डिग्री और मेहनत के दम पर परीक्षा दी और पीछे रह गया। फर्जी डिग्री केवल एक कूटरचित दस्तावेज नहीं। यह मेरिट के खिलाफ षड्यंत्र और समान अवसर के संवैधानिक वादे पर आघात है।

यहां कुछ सवाल सीधे हैं। संदिग्ध विश्वविद्यालयों और वर्षों की पूरी सूची सार्वजनिक क्यों नहीं? फर्जी डिग्रियों को औपचारिक रूप से निरस्त करने की समय-सीमा क्यों नहीं? कितनों ने नौकरी पाई, इसका स्पष्ट आंकड़ा अब तक क्यों नहीं? सख्ती दिखाने में डर किस बात का? अपराध प्रमाणित है, तो निर्णय भी स्पष्ट होना चाहिए। अन्यथा यह धारणा और गहरी होगी कि कार्रवाई आधी है और इरादा भी।