
मूर्तिकला की भारतीय सौंदर्य सृष्टि
डॉ. राजेश
कुमार व्यास
कला समीक्षक
कलाओं के मर्म में जाएंगे तो एक रोचक तथ्य यह भी पाएंगे कि मूर्तिकला के जरिए इतिहास का संधान तो हमारे यहां हुआ है, पर मूर्तिकारों पर कलम प्राय: मौन ही रही है। मूर्तिकला असल में हमारे यहां नृत्य के सर्वाधिक निकट रही है। जब कोई नर्तक मूर्ति की भांति परिमाप, परिप्रेक्ष्य और गति में संतुलन साधता है, तो हम कह उठते हैं, 'अद्भुतÓ! यह जो सराहने की व्यंजना है, असल में वही सौंदर्य का उत्कर्ष है। भांति-भांति के मूर्ति-रूपों पर जाएंगे तो पाएंगे समभंग, अभंग, त्रिभंग और अतिभंग की संरचना वहां है। भावानुकूल मुद्राओं का सौंदर्य संसार लिए। यही गति और संतुलन की साधना है। पर इधर मूर्तिकला में देशभर में जो सिरजा जा रहा है, उसे देखकर लगता है कि सादृश्य के नाम पर भदेस और आधुनिकता की आड़ में अर्थहीन भी बहुत सारा रचा जा रहा है।
ऐसे दौर में रोबिन डेविड की मूर्तियां उम्मीद जगाती हैं। रोबिन भोपाल के हैं। देश-विदेश में विशाल मूर्तिकला शिविरों के जरिए उन्होंने मूर्तिशिल्प की भारतीय परम्परा को एक तरह से पुनर्नवा किया है। रोबिन की मूर्तियां अपनी विशिष्ट व्यंजकता में ही नहीं परिप्रेक्ष्य, परिमाप और गति-संतुलन में सौंदर्य की सृष्टि करती हैं। दिल्ली में यमुना नदी के पास बारापुला के उजाड़ स्थान पर बेंगलूरु की संस्था अ-फोरेस्ट द्वारा विकसित जंगल में उन्होंने कुछ समय पहले बड़ी-बड़ी मार्बल शिलाओं को तराश कर मूर्तियों का सुंदर भव निर्मित किया है। चंडीगढ़ के रोज गार्डन में ली कार्बूजियर की स्मृति को समर्पित उनकी प्रतिमा, ग्वालियर में 'एक पत्थर की बावड़ीÓ और देश-विदेश में 'द कॉलेजियमÓ, 'इवोल्यूशन ऑफ द आर्कÓ, 'फॉलोवरÓ, 'कल्पतरूÓ जैसे उनके मूर्ति शिल्प प्राचीन भारतीय स्थापत्य सौंदर्य के सर्वरूपों में आधुनिकता को भी समय-संदर्भों के साथ समाहित किए हैं। इमारतों, स्थानों और यहां तक कि संगीत के वाद्य यंत्रों के भी प्रतिमानित सौंदर्य को उन्होंने अपने सिरजे से एक तरह से पुनव्र्याख्यायित किया है।
उनकी मूर्तियों में मीनार, सीढिय़ों, बावडिय़ों, प्राचीन नाटकों के प्रेक्षागृहों सरीखी आकृतियों का जीवंत परिवेश भी अलग से लुभाता है। यह ऐसा है जिसे भले ही ठीक से हम पूर्व में देखे की किसी परिभाषा में व्यक्त नहीं कर सकते, परन्तु अचानक हम जाने-पहचाने के बोध में रमते हैं। मुझे लगता है कि उनका तमाम शिल्प इमारतों, प्राचीन स्थापत्य के बाह्य ही नहीं आंतरिक लोक में भी हमें प्रवेश कराता है। काले, लाल, पीले, श्वेत पत्थरों के साथ ही बहुत से रंगों की आभा की रंग-लहरियों का आस्वाद भी उनके सिरजे शिल्प में होता है। इधर टुकड़ों-टुकड़ों में और कुछ समय पहले भोपाल में कोई तीन-चार दिन तक निरंतर रोबिन डेविड से संवाद हुआ। इसी से कुछ महत्त्वपूर्ण पा सका। पता चला, देशभर में वह अपने सृजन के लिए अनुकूल पाषाणों की तलाश में भी भटकते रहे हैं। कभी इसी तलाश में वह मकराना पहुंचे और वहीं बस गए। बरसों वह मकराना में रहे और यहीं 'होमेज टू ताजमहलÓ जैसी सुंदर मूर्ति शृंखला रची। बाद में वह भोपाल लौट गए।
डेविड भांति-भांति के पत्थरों, चट्टानों को अपनी कला के लिए प्रयुक्त करते हैं। वे इतना घना तराशते हैं कि खुरदुरेपन में पत्थर का मूल रंग उभरकर सामने आ जाता है। उन्होंने मार्बल ही नहीं मिट्टी, धातु, लकड़ी आदि के साथ ही कांच में भी मार्बल की ही तरह कलाकृतियां सिरजने के अनूठे सफल-विफल प्रयोग भी निरंतर किए हैं। कांच में कलाकृतियां सिरजने एक साल फिरोजाबाद भी रहे। यह सच है, रोबिन का तमाम सिरजा मूर्तिशिल्प भारतीय परम्परा में आधुनिक बोध लिए अनुभवातीत भव्यता लिए है।
Published on:
02 Jul 2023 08:46 pm
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