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संघीय भावना पर कुठाराघात क्यों..?

चिंता की बात तो यह है कि इस वित्त आयोग की कुछ शर्तें (टम्र्स ऑफ रेफेरेंस) संविधान में निहित संघीय भावना का उल्लंघन करती हैं।

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Sunil Sharma

Jan 02, 2018

PM narendra modi, Arun Jaitley

pm narendra modi, arun jaitley

- प्रणय कोटास्थने

अब अगर यह तीन प्रतिशत की कमी केंद्र सरकार के परेशानियों का सबब बन सकती है , तो केंद्र सरकार की वित्तीय नीति पर इससे बड़ा सवालिया निशान नहीं हो सकता। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि राज्य सरकारें अपने संवैधानिक अधिकार की रक्षा के लिए अपनी चिंताएं वित्त आयोग में दर्ज कराएं।

पंद्रहवें वित्त आयोग ने अपना काम शुरू कर दिया है। करीब दो साल बाद यह आयोग अपनी सिफारिशों को प्रस्तुत करेगा जिसमें यह स्पष्ट किया जाएगा कि 2020—2025 की अवधि में वित्तीय संसाधनों का केंद्र और राज्य सरकारों में बंटवारा किस प्रकार किया जाना चाहिए। वित्त आयोग एक संवैधानिक रचना है जो हर पांच साल में राष्ट्रपति द्वारा गठित की जाती है। उल्लेखनीय है कि योजना आयोग के विघटन के बाद वित्त आयोग की भूमिका और भी बढ़ गई है और इसीलिए वित्त आयोग की सिफारिशों में केंद्र और राज्य सरकारें बहुत रुचि रखती हैं। लेकिन, गुजरात मतदान के शोर में पन्द्रहवें वित्त आयोग के गठन की खबर दब गई।

चिंता की बात तो यह है कि इस वित्त आयोग की कुछ शर्तें (टम्र्स ऑफ रेफेरेंस) संविधान में निहित संघीय भावना का उल्लंघन करती हैं। अगर इन पर ध्यान नहीं दिया गया तो इन शर्तों का राज्यों की नीतिगत स्वायत्तता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। वित्त आयोग के गठन की एक शर्त है कि वह इस प्रश्न पर विचार करेगा कि राज्यों को राजस्व घाटा अनुदान दिया जाना चाहिए या नहीं? आमतौर पर हर वित्त आयोग कर संग्रहण को राज्यों और केंद्र में बांटने के लिए एक फॉर्मूला प्रदान करता है।

इस फॉर्मूले में राज्यों की राजस्व संगृहीत करने की क्षमताओं को ध्यान में रखा जाता है ताकि पिछड़े राज्यों को अधिक सहायता प्रदान की जाए। इस प्रणाली के बावजूद कुछ राज्य अपने राजस्व भार को पूरा करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे राज्यों को संविधान के अनुच्छेद 275 के तहत राजस्व घाटा अनुदान दिया जाता है। उदाहरण के लिए, चौदहवें वित्त आयोग ने ग्यारह राज्यों के लिए 1,94,821 करोड़ रुपए के राजस्व घाटा अनुदान की सिफारिश की थी। अब पन्द्रहवें वित्त आयोग को कहा जा रहा है कि वह इस अनुदान की समीक्षा करे।

अगर नया आयोग नई शर्तों के दबाव में आकर इस अनुदान को समाप्त करता है, तो वह संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन होगा। टम्र्स ऑफ रेफेरेंस में यह भी सुझाव दिया गया है कि पिछले वित्त आयोग के राज्यों की टैक्स आमदनी में हिस्सेदारी बढ़ाने के कदम की समीक्षा की जाए। आरोप यह है कि इस वृद्धि के कारण केंद्र सरकार के पास संसाधन घट गए हैं जिसके कारण उसे अपने ‘न्यू इंडिया 2022’ के लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल हो गया है इसीलिए वित्त आयोग के जरिये केन्द्रीय योजनाओं की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए राज्यों के कर हस्तांतरण को कम करने की ओर इशारा किया जा रहा है।

इस तर्क के साथ तीन प्रकार की समस्याएं हैं। एक, कर हस्तांतरण राज्यों का संवैधानिक अधिकार है। केंद्र सरकार का इस आवंटन को कम करने का कोई भी प्रयास संविधान की संघीय भावना का उल्लंघन कहा जा सकता है। कर हस्तांतरण से प्राप्त राजस्व को राज्य सरकारें अपनी सोच-समझ और प्राथमिकताओं के अनुसार खर्च कर सकती हंै । उदाहरण के लिए, बिहार सरकार यह तय कर सकती है कि प्राथमिक शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाए जबकि केरल सरकार तय कर सकती है कि इस आय को रोजगार वृद्धि के लिए उपयोग किया जाए।

अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग परिस्थितियां हैं और उन परिस्थितियों के अनुसार उनकी आवश्यकताएं अलग-अलग होती हैं। इन आवश्यकताओं के मद्देनजर ही राज्य सरकारें अपने फैसले करती हैं। इस राजस्व श्रेणी को कम करने से राज्य अधिकाधिक केंद्रीय योजनाओं को लागू करने वाले एजेंट मात्र रह जाएंगे। दूसरा, केंद्र सरकार का राज्यों के विषयों में हस्तक्षेप लगातार बढ़ता जा रहा है। चौदहवें वित्त आयोग के विश्लेषण से पता चलता है कि राज्य सूची पर केंद्र सरकार का खर्च 2002-05 में 14 फीसदी था जो 2005-11 में बढक़र 20 फीसदी हो गया और इसी समय में समवर्ती सूची पर खर्च 13 फीसदी था जो 2005-11 के दौरान 17 फीसदी के स्तर पर आ गया।

अगर केंद्र सरकार को संसाधन जुटाने में परेशानी हो रही है, तो उसे राज्यों के दायरे में आने वाले विषयों पर अपने खर्च को सीमित करने पर विचार करना चाहिए। तीसरी बात, यह गलत खबर फैलाई जा रही है कि चौदहवें वित्त आयोग ने कर हस्तांतरण में एकाएक राज्यों का हिस्सा 32 फीसदी से बढ़ाकर 42 फीसदी करके केंद्र सरकार को मुश्किल में डाल दिया है। वास्तविकता यह है कि चौदहवें वित्त आयोग ने योजना और गैर-योजना व्यय दोनों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा था और सही मायनों में वृद्धि 39 फीसदी से 42 फीसदी की हुई है।

यहां पर सोचने वाली बात यह है कि अब अगर यह तीन प्रतिशत की कमी केंद्र सरकार के परेशानियों का सबब बन सकती है, तो केंद्र सरकार की वित्तीय नीति पर इससे बड़ा सवालिया निशान नहीं हो सकता। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि राज्य सरकारें अपने संवैधानिक अधिकार की रक्षा के लिए अपनी चिंताएं वित्त आयोग में दर्ज कराएं। यदि उचित अधिकार नहीं मिलें तो इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय तक भी जाना पड़े तो जाएं क्योंकि यह एक संवैधानिक मामला है। इस बात का आखिरकार केंद्र सरकार को ध्यान रखना ही होगा कि राज्य सरकारों के साथ भागेदारी किए बिना ‘न्यू इंडिया-2022’ का लक्ष्य पाना किसी भी स्थिति में असंभव होगा।