
gulab kothari, Gulab Kothari Article, gulab kothari articles, hindi articles, Opinion, rajasthan patrika article, rajasthanpatrika articles, religion and spirituality, special article, work and life
- भुवनेश जैन
मध्यप्रदेश के ताजा राजनीतिक घटनाक्रम ने इस बात को और पुख्ता कर दिया है कि भारतीय जनता पार्टी भी कांग्रेस की राह पर तेजी से चल निकली है। येन-केन प्रकारेण सत्ता हासिल करना, निर्णयों का पूरी तरह केन्द्रीयकरण और क्षेत्रीय नेताओं की अवहेलना- ये वे बातें थीं, जिनके लिए कांग्रेस जानी जाती रही है, खासतौर से इंदिरा गांधी के कार्यकाल में तो इस तरह की मनमानियां बहुत हुई थीं और पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो गया था। ये दुर्गुण पार्टी में आगे भी बने रहे और "आलाकमान" देश की सबसे बड़ी मानी जाने वाली पार्टी में फैसलों का केन्द्र बना रहा। और इन्हीं दुर्गुणों ने बाद में कांगे्रस को समेट कर रख दिया।
भाजपा ने अपनी शुरुआत "पार्टी विद डिफरेंस" के वादे से की थी। राज्यों में पार्टी के लिए काम करने वाले लोग कार्यकर्ता से मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री पदों तक पहुंचे। राजस्थान में भैरोंसिंह शेखावत, वंसुधरा राजे, मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह और छत्तीसगढ़ में डा. रमन सिंह सहित बीसियों उदाहरण पार्टी में हैं। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी एक कार्यकर्ता से मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से लगने लगा है कि अब कांग्रेस और भाजपा के बीच का "डिफरेंस"(अन्तर) समाप्त हो चला है। भाजपा में भी आलाकमान संस्कृति पनप गई है। हर छोटे-बड़े निर्णय में सामूहिक विचार-विमर्श की बजाय केन्द्रीयकृत निर्णय हावी होने लगे हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया से समझौता कर लिया गया। यहां तक तो फिर भी सहनीय होता, लेकिन शिवराज सिंह चौहान के 33 सदस्यीय मंत्रिमंडल में 11 स्थान उन लोगों को दे दिया जाना, जो कांग्रेस छोडकऱ आए थे, जनता को ही नहीं, क्षेत्रीय नेताओं को भी नागवार गुजर रहा है। और फिर अब "अच्छे" विभाग पाने की खींचतान शुरू हो गई। चार दिन से विभाग नहीं बंट पा रहे। एक-एक कदम "आलाकमान" से पूछ कर बढ़ाना पड़ रहा है।
कर्नाटक में भी इसी तरह का दृश्य देखने को मिला था। कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिरा येड्डियुरप्पा सरकार बना तो ली गई, पर मंत्रियों के नामों से लेकर विभागों के बंटवारे तक पार्टी आलाकमान के निर्णय चले थे। हरियाणा से लेकर हिमाचल और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों को भी बात-बात पर दिल्ली भागना पड़ता था। कांग्रेस में भी यही सब होता था, बल्कि आज तक हो रहा है।
स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र बना रहे। जमीनी स्तर पर काम करने वाले क्षेत्रीय नेताओं को अपनी पसंद की सरकार बनाने और फैसले करने की आजादी हो। कांगे्रस को संभवत: इसीलिए दुर्दिन देखने पड़े क्योंकि वहां आंतरिक लोकतंत्र नाम का कुछ नहीं बचा था। कांग्रेस के नक्शे-कदम पर चल कर क्या भाजपा भी उसी अंजाम की ओर बढऩा चाह रही है?
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
