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जनता को भरमाने के लिए एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने से कोई हल निकलने वाला नहीं। भ्रष्टाचार मिटाना है तो चंदे के धंधे पर भी प्रहार करना होगा।

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Sunil Sharma

Oct 11, 2017

politics

rahul gandhi amit shah

भारत की राजनीति में भी अजीब गड़बड़ झाला है। ऐसा गड़बड़झाला जिसे सिर्फ देश के राजनेता ही समझ सकते हैं। जनता के तो आज तक न समझ में आ पाया है और न ही समझ आने की उम्मीद है। गुजरात-हिमाचल प्रदेश के चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दल और इसके नेता एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने में जुट गए हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांगे्रस, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पुत्र के बहाने भाजपा को घेर रही है तो भाजपा राहुल गांधी को। राहुल गांधी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा रहे हैं तो मोदी पूरी कांग्रेस को जमानत पर चल रही पार्टी बता रहे हैं।

खास बात ये कि हर राजनीतिक दल और हर राजनेता सिर्फ विरोधी से ही सवाल पूछ रहा है। जवाब देने को कोई राजनीतिक दल तैयार नहीं। न अपने विरोधियों को और न अदालतों को। दिल्ली हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार से एक बार फिर सवाल किया है। पूछा है कि सरकार छह सप्ताह में जांच करके बताए कि भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों को विदेशों से कितना चंदा मिला है? अदालत पहले भी अनेक बार पूछ चुकी है लेकिन जवाब है कि मिल ही नहीं रहा। सवाल यह है कि केन्द्र सरकार विदेशी चंदे की आवक के बारे में तथ्य छिपाना क्यों चाह रही है? क्या विदेशों से चंदा लेकर उसे सार्वजनिक नहीं करने को भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं माना जाए? विदेशी चंदा ही क्यों, देशी चंदे का हिसाब भी आज तक साफ नहीं हो पाया है।

चैक से लिए जाने वाले चंदे का आधा-अधूरा हिसाब तो फिर भी सामने आ जाता है लेकिन कैश में लिए जाने वाले चंदे का हिसाब कोई नहीं जानता। यही चंदा भ्रष्टाचार को जन्म देता है। जनता को भरमाने के लिए एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने से समस्या का कोई हल निकलने वाला नहीं। देश से भ्रष्टाचार मिटाना है तो चंदे के धंधे पर भी प्रहार करना होगा और कमीशन-रिश्वत पर भी। अन्यथा सरकारें यूं ही आती-जाती रहेंगी, हमेशा की तरह एक-दूसरे को कठघरे में भी खड़ा करती रहेंगी लेकिन समस्या का समाधान निकलने की उम्मीद नहीं है। चुनाव के समय अपनी कमीज सफेद दिखाते-दिखाते दशक बीत गए। अब बारी भ्रष्टाचारी को सजा दिलाने की है। चाहे वह अपना हो या विरोधी।