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आपकी बात, सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण क्या उचित है?

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

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Gyan Chand Patni

Mar 16, 2021

आपकी बात, सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण क्या उचित है?

आपकी बात, सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण क्या उचित है?

संविधान की मूल भावना के खिलाफ
सार्वजनिक संस्थाओं का निजीकरण संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है। निजीकरण से सामाजिक और आर्थिक न्याय की प्राप्ति नहीं हो सकती। इससे केवल बड़े उद्योगपतियों को लाभ होगा और पूंजी के केन्द्रीकरण से वर्गभेद को बढ़ावा मिलेगा। निजीकरण की व्यवस्था अधिकाधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति पर आधारित है, जिसमें सार्वजनिक और सामाजिक हितों की उपेक्षा होती है। इस व्यवस्था में मजदूरों के श्रम का शोषण होता है और कर्मचारियों की छंटनी कर बेरोजगारी में वृद्धि की जाती है। जनहित में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की कार्यकुशलता में सुधार करके निजीकरण की प्रवृत्ति से बचना चाहिए ।
-सुरेश चन्द्र सर्वहारा, कोटा
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घातक सिद्ध होगा सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण
भारत एक विकासशील देश है। अत: यहां सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण बहुत ही घातक सिद्ध होगा। भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की बड़ी आबादी दो समय का भोजन भी बड़ी मुश्किल से जुटा पाती हैं। अत: यहां सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण करना एक तरह से गरीब के पेट पर लात मारने के समान है। अत: सरकार को सीधे जनता से जुड़े सार्वजनिक क्षेत्रों का तो निजीकरण किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए। निजीकरण से जनता का शोषण ही बढ़ेगा। घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण करना तो सही है, परन्तु सभी सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण नहीं करना चाहिए।
-कैलाश चन्द्र मोदी, सादुलपुर, चूरू
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व्यवस्था सुधारी जाए
सार्वजनिक संस्थान देश को मजबूत करते हैं। जनहित का ध्यान रखना सरकार का परम कर्तव्य है। निजीकरण की अंधी दौड कहीं लोकतंत्र को कमजोर न कर दे। निजीकरण की बजाय व्यवस्था में सुधार पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए उचित प्रबंधन करना चाहिए।
-कृष्ण कुमार जोशी, मंदसौर
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सरकारी बैंकों का निजीकरण उचित नहीं
सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण उचित नहीं है। गरीबों और बेरोजगार का बैंक अकाउंट कौन खोल रहा है? सरकारी योजनाओं से जुड़े ऋण कौन बांट रहा है? यह काम सरकारी बैंक ही कर रहे हैं।
-मुकेशभाई व्यास, जामनगर
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बढ़ेगी गरीब-अमीर के बीच की खाई
सार्वजनिक संस्थानों को निजी हाथों में देने से महंगाई बढ़ेगी और गरीब आदमी की जेब पर सीधा असर दिखाई देगा। वर्तमान में अमीर और गरीब के बीच जो खाई है, वह और बढ़ेगी। इसलिए निजीकरण उचित नहीं है ।
-राजीव मालवीय, अशोकनगर, मप्र
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इनका न हो निजीकरण
सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण से घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों की हालत में सुधार होगा। हां, कुछ विशेष क्षेत्रों में निजीकरण को बढ़ावा देना उचित नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रेलवे, परिवहन प्रणाली जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र सरकार को अपने पास ही रखने चाहिए।
-गजेन्द्र नाथ चौहान, राजसमंद
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बढ़ेंगी आर्थिक गतिविधियां
सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को निजी निवेशकों के लिए खोले जाने से आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होगी। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का विकास होगा, जो अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी साबित होगा
-संदीप स्वर्णकार जहाजपुर भीलवाड़ा
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ठीक नहीं है निर्णय
देश के सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण करना अनुचित है। इनके निजीकरण से केवल धनाढ्य लोगों को ही फायदा होगा। इसलिए सार्वजनिक संस्थाओं का निजीकरण देश को गर्त में डालने का काम है
-कमलेश कटारिया, तिंवरी, जोधपुर
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जनता का शोषण होगा
देश के सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण करना जनता जनार्दन के अधिकारों पर कुठाराघात है। निजीकरण करने से देश की जनता को कई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। अधिक मुनाफा कमाने के लिए जनता का शोषण होगा और जनहित की अनदेखी होगी।
-श्रीकृष्ण पचौरी, ग्वालियर
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जरूरी है निजीकरण
सार्वजनिक संस्थानों की दशा कितनी खराब है यह सर्व विदित है। इसके विपरीत निजी संस्थान बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। निजी क्षेत्र में काम करने वालों की कार्यकुशलता पर नजर रखी जाती है, जिससे वहां बेहतर माहौल होता है। इसलिए निजीकरण जरूरी है।
-ओम हरित ,फागी, जयपुर
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एक सीमा तक ही हितकारी है निजीकरण
देश में मिश्रित अर्थव्यवस्था को महत्त्व दिया गया। भारत में पूर्ण निजीकरण लाभदायक नहीं है। कुछ संस्थाएं सरकार के नियंत्रण में भी जरूरी हैं, जिससे संतुलन बना रहे। अर्थव्यवस्था को सरकारी और निजी निवेश दोनों की जरूरत है। इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि निजी संस्थान मनमानी न कर पाएं। इसलिए निजीकरण एक सीमा तक ही हितकारी है।
-डॉ.अजिता शर्मा उदयपुर