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उजड़ा कूंचा-ए-यार कहीं और जा बसें

मैं जयपुर हूं। ना-ना करते भी आज २९० साल का हो गया हूं। एक जमाना था जब मैं अपनी खूबसूरती पर खूब गर्व करता था।
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Sunil Sharma

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Updated: 18 Nov 2017, 1:00 PM IST

Jaipur

Jaipur

- गोविंद चतुर्वेदी

मैं जयपुर हूं। ना-ना करते भी आज २९० साल का हो गया हूं। एक जमाना था जब मैं अपनी खूबसूरती पर खूब गर्व करता था। हाथी से ज्यादा मतवाला होकर। मैं ही क्यों मुझे जानने और देखने वाले भी मुझ पर गर्व करते थे। बहुत से विदेशियों तक को मुझसे ‘इश्क’ हो गया था। ‘रश्क’ करने वाले भी कम नहीं थे। खासतौर पर पेरिस वाले। जब वे सुनते कि मैं भारत का पेरिस हूं। यह वो दौर था जब मेरे साथ मुझे बसाने वालों का भी खूब नाम होता था। फिर वो महाराजा जयसिंह हों या फिर वास्तुकार विद्याधर चक्रवर्ती अथवा तंत्र-मंत्र के ज्ञाता जगन्नाथ सम्राट। सबने मिलकर मुझे ऐसा सुधड़-सलौना बनाया कि, मैं आज तक खड़ा हूं। उम्र के साथ बढ़ा तो दो हाथ मिर्जा इस्माइल के भी लग गए। मेरा गुलाबी रंग दुनिया भर में मेरी पहचान बन गया। वक्त के साथ देश-दुनिया के लाखों लोग तो केवल मुझे देखने आने लगे। लोगों को कितना रुपया, डॉलर, पाउंड और दिरहम मुझ पर लुटाया, मुझे याद नहीं। गिनने वाले भी थक गए।

कहते हैं वक्त एक-सा नहीं रहता। कूड़े के ढेर के भी दिन फिरते हैं तो महलों के भी दिन फिरते हैं। नजर लग जाती है। उतारने वाले हों तो उतार देते हैं नहीं तो काली नजर बिस्तर पकड़वा देती है। कच्चे करवे तो कई बार जानलेवा हो जाते हैं। आगे क्या होगा, महाराज जाने पर नजर ने बिस्तर तो पकड़वा ही दिए हैं। पीलिया के मरीज जैसी मेरे चेहरे की रौनक हो गई है। कभी चौड़ी-चौड़ी सडक़ें मेरी शान हुआ करती थीं आज वे अतिक्रमण से अटी पड़ी हैं। गंदगी का तो भगवान ही मालिक है। न बरसाती पानी का संरक्षण होता है न गंदे पानी का निकास। सुरक्षा की तो बात ही मत करो। मैं अपने दरवाजों को ही टूटने से नहीं बचा पाया तो शहर क्या बचा पाऊंगा। और बचाऊ भी किसे?

जो मेरे अपने थे वो तो ज्यादातर मेरा बुढ़ापा देख, मुझे मेरे हाल पर छोड़ खिसक लिए। पण्डितों ने ब्रह्मपुरी खाली कर दी तो राजपूतों ने रामगंज। लक्ष्मीपतियों को भी जौहरी बाजार के बजाय सी-स्कीम या वैशाली अच्छा लगने लगा। बिस्तर पर पड़ा हूं। नित्यकर्म के लिए उठ-बैठ तो लेता हूं। पर पता नहीं कितने दिन जी पाऊंगा। आज शेखावाटी हवेलियां खण्डहर हो रही है, कल मैं भी खण्डहर हो जाऊंगा। कभी-कभी सोचता हूं बनाने वालों ने मुझे ऐसा सलौना कैसे बनाया होगा। पूरा नाप-तौलकर। कहीं जयगढ़ तो कहीं जन्तर-मन्तर। कहीं जलमहल तो कहीं हवामहल। रामगढ़ की झील से लेकर सरगासूली, आमेर, अलबर्ट हॉल, सिटी पैलेस और ना जाने क्या-क्या?

पर पिछले ७० सालों में तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। कोई जयसिंह और कोई विद्याधर या जगन्नाथ सम्राट पैदा नहीं हुआ। ‘वीर विहीन महि मैं जानी’ जैसा माहौल दिख रहा है। परकोटा टूट रहा है। जिस सडक़ पर कभी छज्जा नहीं निकल सकता था आज बिल्डिंगें खड़ी हो रही हैं। सरकार तो सरकार जनता भी मुझसे अपनापा खो रही है। इस शहर में कभी दिल की चलती थी। रिश्ते बोलते थे। तभी तो बंगाल तक से लोग चलकर जयपुर आ गए। आज तो मेरे अपने भी मुझे छोडक़र जा रहे हैं। तब किससे उम्मीद करुं, क्या उम्मीद करुं? अब तो गैटोर की छतरियां भी पहले जैसी सुकुन भरी नहीं रही। तब मुझे भी मुगल सल्तनत के आखिरी शहंशाह बहादुर शाह जफर की शायरी याद आती है।

‘दो गज जमीन भी ना मिली कंूचा-ए-यार में।
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में॥
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें।
इतनी जगह कहां है दिल-ए-दागदार में॥’

‘जयपुर’ का जो हाल-बेहाल होता जा रहा है, उसमें शायद ‘जैपर’ को भी दो गज जमीन नहीं मिले।