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जोशीमठ त्रासदी भविष्य के लिए हिमालय का संकेत

बड़ी बहस का मुद्दा यह कि पहाड़ी राज्यों के लिए विकास की सही विधि क्या हो  

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जयपुर

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Patrika Desk

Jan 19, 2023

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अनिल प्रकाश जोशी
पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित पर्यावरणविद
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आज जोशीमठ त्रासदी को कई रूपों में देखा जा सकता है। पहला बड़ा पहलू यह कि हिमालय एक संवेदनशील क्षेत्र है और यहां किसी भी तरह की सीमा से अधिक छेड़छाड़ प्रकृति को किसी भी तरह स्वीकार नहीं है। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात, यह त्रासदी इस ओर इशारा करती है कि हमें क्षेत्र विशेष, खास तौर से हिमालय, में धारण क्षमता से अधिक किसी भी रूप से कैसा भी विकास स्वीकार नहीं होना चाहिए। तीसरी महत्त्वपूर्ण बात यह कि हिमालय अब भी निर्माण की प्रक्रिया में है।

इन सब बातों में हमने एक लंबे समय से कभी भी कोई गंभीर भागीदारी नहीं की, समझ नहीं बनाई। यही कारण है कि जोशीमठ एक उदाहरण बना। सच तो यह है कि जोशीमठ भले ही इन वर्षों में चाहे जिस तरह चर्चा में आया हो लेकिन प्रकृति के प्रति जो समझ है वह इस रूप में भी देखी जा सकती है कि हिमालय में जहां-जहां पहाड़ हैं वे मलबे के ढेर की तरह हैं और वहां पर कुछ स्थान समय-समय पर इंसानी बस्तियों के लिए निर्धारित किए गए। जोशीमठ भी उन्हीं में से एक है। कल्पना की जा सकती है कि जोशीमठ एक समय छोटा-सा गांव रहा होगा, जो समय के साथ पहले एक छोटे कस्बे में तब्दील हुआ और बाद में बद्रीनाथ धाम पर्यटन के कारण विस्तार लेता चला गया। अपनी धारण क्षमता से जोशीमठ बहुत आगे चला गया। साथ में कोई नीति न होने के कारण बेरोक-टोक ढांचागत विकास होता रहा। स्थानीय निकाय ने भी अपनी भूमिका नहीं निभाई। जलनिकासी व्यवस्था के अभाव, मिट्टी के कच्चेपन और सीवेज का कोई रास्ता न होने के कारण सब कुछ मिट्टी में समाता चला गया। इन सबके अलावा पहाड़ का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं है जहां किसी नदी का सीधा असर न हो। जोशीमठ की बात करें तो अलकनंदा नदी की यहां अहम भूमिका है। पहाड़ों में सभी नदियां घाटी की तलहटी को काटती ही हैं। यह कहीं कम होता है तो कहीं ज्यादा। अन्य नदियों की तरह जोशीमठ में भू-धंसाव की वजह अलकनंदा से हुई टो-कटिंग है। टो-कटिंग का असर कितना होगा, यह इस पर भी निर्भर करता है कि उस पहाड़ विशेष में मानवीय गतिविधियों के चलते कितना हस्तक्षेप हुआ है। जोशीमठ के चारों ओर जिन योजनाओं पर काम चल रहा था, उन्होंने भी किसी न किसी रूप में जोशीमठ के भौगोलिक स्वरूप और इसकी पारिस्थितिकी के साथ छेड़छाड़ में भागीदारी की। वर्ष 2021 की रैणी आपदा को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। रैणी में हिमस्खलन के चलते तब एक निर्माणाधीन छोटा बांध तहस-नहस हो गया था, दो सौ से ज्यादा लोग हताहत हुए थे और कई तरह के अन्य संसाधनों का भी नुकसान हुआ था।

सवाल यह पैदा होता है कि आज जोशीमठ त्रासदी के लिए किसे दोषी माना जाए। जाहिर है न तो सरकारों को पूरी तरह निर्दोष करार दिया जा सकता है, न ही गैर-सरकारी लोगों और संस्थाओं को। यह त्रासदी दोनों ही पक्षों की गलतियों और लापरवाही का परिणाम है। स्थानीय स्तर पर भी कई जरूरी ढांचागत पहलुओं को लगातार नजरअंदाज किया जाना इस त्रासदी की एक वजह है। कुल मिलाकर इन सभी कारणों ने एक ऐसी त्रासदी और भय को पैदा किया जो आने वाले समय में हिमालय की ओर से एक संकेत की तरह देखा जाना चाहिए। आज सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि समूचे हिमालयी क्षेत्र में बसे लोगों को फिर ऐसी किसी त्रासदी का सामना न करना पड़े इसके लिए समग्रता के साथ हम मौजूदा विकास के मॉडल पर पुनर्विचार करें। तभी प्रभावित लोगों को सही मायनों में जरूरी राहत भी पहुंचाई जा सकेगी।

अब यदि जोशीमठ की त्रासदी को मात्र एक घटना के रूप में देखा और समझा गया तो वह और भी बड़ी त्रासदी होगी। जोशीमठ पर केंद्रित तमाम बचाव और सुधार के कार्यों तक सीमित न रहते हुए अब वक्त पूरे हिमालय की संवेदनशीलता को समझने और स्वीकारने का है और हिमालयी क्षेत्र में ढांचागत विकास के मापदंडों के प्रति गंभीरता दिखाने का है। उत्तराखंड हो या हिमालय, लोगों को विकास योजनाओं की प्रतीक्षा तो रहती ही है। जब उत्तराखंड राज्य बना था, तब भी विकास ही सबसे बड़ा मुद्दा रहा था और यह मुद्दा आज भी अपनी जगह कायम है। विकास जरूरी तो है, लेकिन इस विकास के लिए कौन-सी विधि अपनाई जाए, यह बड़ी बहस का मुद्दा होना चाहिए। जोशीमठ की घटना और इसकी पीड़ा ने हमें कई सबक दिए हैं। जोशीमठ का 30 प्रतिशत क्षेत्र आज प्रभावित हुआ है, जिसमें मात्र 2.5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 4000 घर और 400 कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बढ़ते दबाव का पर्याप्त संकेत हैं। जोशीमठ त्रासदी की हिमालयी क्षेत्र में पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए बड़े कदम उठाने ही होंगे।