
तृप्ति पांडेय
पर्यटन व संस्कृति विशेषज्ञ
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यों तो कैंचीधाम नैनीताल और भीमताल के पास है पर ठहरने के इंतजाम और मौसम के बदलते रंग के चलते भीमताल की जगह मुक्तेश्वर से ही जाना तय हुआ। वैसे भी गर्मी की छुट्टियों के चलते और खासतौर से शनिवार और मंगलवार को वहां हनुमान भक्तों की भीड़ रहती है। कैंचीधाम का नाम वहां जाने वाले रास्ते का कैंची की तरह दो भागों में बंटने के कारण पड़ा। वह धाम, जिसे नीम करौली बाबा ने बनाया। वे बाबा जिनका नाम मैंने उन दोनों के कारण जाना जिनके बनाए हुए साधन मेरे जैसे बहुत से लोग काम में लेते हैं। स्टीव जॉब के ऐपल के कंप्यूटर और आइफोन और फेसबुक ऐप बनाने वाले मार्क जुकरबर्ग, जिन्हें उनके आश्रम में जाने के बाद कुछ विशेष अनुभव हुए। बाद में तो फिर काफी कुछ पढ़ा।
बाबा हनुमानजी के बहुत बड़े भक्त थे। कैंचीधाम में उन्होंने हनुमानजी का मंदिर बनवाया। इसी कारण कैंचीधाम का एक नाम हनुमानगढ़ी भी है। हम सोमवार को गए थे पर फिर भी भीड़ भारी थी। अच्छे इंतजामों के चलते पार्किंग भी आसानी से मिली और मंदिर में जाना भी आसान रहा। बाबा का पलंग और कम्बल, जो उनकी पहचान थे, वे अब उनके वहां होने का अहसास दिलाते हैं। अंदर छोटे-छोटे मंदिर हैं और पूरे परिसर में जगह जगह भक्त हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे। वहां प्रसाद चढ़ाया नहीं जाता पर बाहर निकलते समय चने का गर्म-गर्म प्रसाद का स्वाद कभी नहीं भुला पाऊंगी। वहां जाना मन को बहुत अच्छा लगा। अंदर फोटो खींचने पर मनाही है पर फिर भी लोग सेल्फी खींचने की कोशिश में डांटे जाते हैं। मैंने दूर से सिर्फ मंदिर की फोटो खींची। हमारा पूरा दिन निकल गया और दूसरी सुबह वापस लौटना था। मैंने फिर होटल मैनेजर से बातचीत कर सुबह-सुबह होटल में ही काम करने वाले स्थानीय बाशिंदे के साथ वादी की पगडंडियों पर घूमने जाना तय किया। वह चिडिय़ों का जानकार भी था। सुबह होने पर पता पड़ा कि दिल्ली से आए चार और लोग भी साथ जाने वाले थे। पूरा ट्रैक था तो ३.५ किलोमीटर लंबा, पर ऊबड़-खाबड़ पगडंडी कभी नीचे उतरती कभी ऊपर चढ़ती। जैसे-जैसे हम आगे बढ़े, मुक्तेश्वर का ग्रामीण जीवन सामने आने लगा। वहां के लोगों के घर एक-दूसरे से काफी दूरी पर थे आधे कच्चे आधे पक्के। छतों पर कटी फसल लदी, जानवरों का बाड़ा, सामने बगिया में महकते गुलाब के फूल, नीचे छोटे-छोटे खेत, कहीं धान की फसल तो कहीं आलूबुखारे और सेब से लदे पेड़। अभी कुछ दूर ही चले थे कि दिल्ली से आए चारों लोगों के हौसले पस्त हो गए। उस कठिनाई भरी पगडंडी पर स्कूल की किताबों से भरे बैग टांग कर जाते हुए बच्चे भी देखे। उस वादी में चलते हुए मुझे फिर जिम कॉर्बेट याद आ गए जिन्होंने ऐसी ही बस्तियों से जानवर और इंसान मारने वाले बाघ मारे थे। मुक्तेश्वर के प्राकृतिक सौंदर्य की चर्चा उन्होंने अपनी किताब में भी की क्योंकि हिमालय का जितना सुंदर दृश्य वहां से दिखता है, किसी और पहाड़ी इलाके से नहीं दिखता और उन्हें वहां की आबोहवा भी सबसे बेहतरीन लगी थी।
उसी आबोहवा के कारण वहां वे केंद्र भी हैं जहां वह नोबल विजेता वैज्ञानिक भी बुलाए गए थे जिन्होंने टी.बी. जैसी लइलाज बीमारी के इलाज की राह दिखाई थी। जर्मनी के डॉक्टर हैनरिक हरमन रॉबर्ट कौख जीवाणु विज्ञान (माइक्रोबायोलॉजी) के एक संस्थापक थे। यदि खास लोगों की मूर्तियां जानकारी बढ़ाने और प्रेरणा के लिए बनाई जाती हैं तो ये मूर्तियां ऐसे खास वैज्ञानिकों की होनी चाहिए। मुक्तेश्वर से 35 किलोमीटर दूर ही भोवली है, जहां अंग्रेजों ने 1912 में टी.बी. सैनिटोरियम बनाया था जो आज भी चल रहा है। मुक्तेश्वर छोटा और बहुत सुंदर हिल स्टेशन है जहां मशहूर हिल स्टेशन वाली चमक-दमक व ऐशो-आराम तो नहीं है पर चमक-दमक और ऐशो-आराम की गैर-मौजूदगी से इसकी अपनी पहचान भी बनी है। कुमाऊं से तो जान-पहचान ही हुई, अभी तो वहां बहुत कुछ देखना है।
Published on:
01 Aug 2023 08:25 pm
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