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अपनों का तमाचा

भाजपा के ही विधायकों ने जिस तरह चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ को सरकार की विफलताओं पर घेरा, वैसी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी

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Kali Charan Saraf

भुवनेश जैन

जब अपने भी तमाचा मारने लग जाएं तो पीड़ा असहनीय हो जाती है। कोटा में गुरुवार को राज्य सरकार को इस दर्द का अहसास हो गया होगा। भाजपा के ही विधायकों ने जिस तरह चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ को सरकार की विफलताओं पर घेरा, वैसी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। मंत्री महोदय बौखलाहट में इतना ही बोल पाए कि बहिष्कार करने वाले विधायक के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।


डेंगू, स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियों पर चर्चा करने के लिए सराफ कोटा गए थे। वहीं उन्हें मेडिकल कॉलेज सभागार में विधायकों ने घेर लिया। बैठक में और इससे पूर्व विधानसभा में सरकार की ओर से पेश रिपोर्ट में कोटा में इन बीमारियों से अब तक ४ मौतें होना ही बताया गया था। विधायकों ने इसे गलत बताते हुए कहा कि अकेले कोटा में ही १०० से ज्यादा मौतें हुई हैं, पूरे हाड़ौती में १६५ लोग मर चुके हैं। विधायकों ने इस विफलता के लिए चिकित्सा मंत्री को आड़े हाथों लिया। लाडपुरा विधायक भवानी सिंह राजावत तो बैठक का बहिष्कार करके चले गए।


भले ही भाजपा विधायक पानी सिर से गुजर जाने के बाद विरोध में उतरे हों, पर राजस्थान की जनता लगातार चिकित्सा विभाग की निष्क्रियता और अकर्मण्यता का शिकार हो रही है। मौसमी बीमारियां फैलती हैं तो बैठकों और बयानों के दौर चलते हैं, पर वास्तव में जमीन पर क्या होता है, यह सब जानते हैं। राज्य सरकार ने लाचार जनता को जैसे ऊपर वाले के रहमो-करम पर छोड़ रखा है। मुख्यमंत्री हो या चिकित्सा मंत्री जहां भी जाते हैं, बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर आते हैं। पर वे कागजी ही रह जाती हैं।


मौसमी बीमारियां महीनों से शहरों और गांवों को लपेटे में ले रही हैं। गांव में स्वास्थ्य केन्द्रों पर न चिकित्सक पर्याप्त हैं न नर्सिंगकर्मी। मच्छरों के प्रसार को रोकने के लिए एन्टीलार्वा छिडक़ाव व फोगिंग कागजों में भले ही होती हो-वास्तव में तो कहीं होती दिखाई देती नहीं।

सफाई के लिए जिम्मेदार संस्थाओं में काम कम और राजनीति ज्यादा हो रही है। अफसर ‘एलाइजा’ व ‘कार्ड टेस्ट’ जैसी शब्दावली में सरकार को घनचक्कर बना रहे हैं। उनके लिए मौतें भी भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं। सरकार का तो दूर-दूर तक संवेदनाओं से वास्ता नहीं है।

जब जयपुर के दंगे के दौरान किसी को जनता के बीच जाने की फुर्सत नहीं मिली तो हारी-बीमारी में तो दूर की बात है। मंत्रियों के लिए दौरों का मतलब केवल सर्किट हाउसों में विश्राम, एयरकंडीशन सभागारों में बैठकर डांट-डपट करना और मंचों पर भाषण देना रह गया है। अहंकार ने उनके और जनता के बीच गहरी खाई खोद दी है।


असंतोष का धुआं जनता से शुरू हुआ। भाजपा कार्यकर्ता और स्वयंसेवक भी समय-समय पर असंतोष प्रकट करते रहते हैं। अब जब विधायक भी इसी भाषा में बात करने लगे तो केवल अनुशासन की तलवार कब तक काम आएगी?