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Leadership: भगवद्गीता में कर्मयोग नेतृत्व

लेखकों ने भगवद्गीता को ‘संकट हस्तक्षेप मनोचिकित्सा का संभवत: पहला रेकॉर्ड किया गया प्रमाण’ बताया है। उनका प्रस्ताव है कि कर्म योग ‘चिकित्सीय तनाव, चिंता और आशंका को कम करने के लिए चिकित्सीय पद्धति के रूप में कार्य कर सकता है, जिससे मनोरोग और इससे संबंधित चिकित्सीय मुद्दों से जुड़ी रुग्णता को कम किया जा सकता है।’

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जयपुर

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Patrika Desk

Dec 25, 2022

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प्रो. हिमांशु राय
निदेशक, आइआइएम इंदौर
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पिछले आलेख में आपने पढ़ा कि कर्मयोग लीडरशिप में क्या मायने रखता है। नेतृत्व पर कई भारतीय विद्वानों ने कत्र्तव्य नैतिकता और नेतृत्व प्रभावशीलता के सिद्धांत के रूप में पारंपरिक जटिल दर्शन को स्थानांतरित करने के लिए कर्म योग के अध्ययन की कोशिश की है। शोधकर्ता जेड.आर. मुल्ला और वी.आर. कृष्णन ने अपने शोध में कर्म योग को ‘बुद्धिमानी से कार्य करने की एक तकनीक’ या ‘कार्यों को इस तरह से करने की एक तकनीक जिससे आत्मा कर्मों के प्रभाव से बंधी नहीं रहती’ के रूप में परिभाषित किया। कर्म योग को एक व्यवहार चर के रूप में वर्णित करने के प्रयासों से यह तीन आयामों में प्रकट होता है द्ग ‘कत्र्तव्य के प्रति झुकाव’, ‘पुरस्कारों के प्रति उदासीनता’ व ‘समभाव’। आइए जानते हैं इनके बारे में -

1. कर्त्तव्य के प्रति झुकाव: हमारे शरीर में कार्य करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, और हम इन्द्रिय बोध पर प्रतिक्रिया करते हैं, जो पहले इच्छाओं और फिर जन्म-मृत्यु के शाश्वत चक्र में ले जाता है। कर्म योग इसे कम करने का एक तरीका है और दायित्व की भावना के साथ अपने कर्त्तव्यों को पूरा करके समाज में प्रभावी ढंग से कार्य करने में सहायक है। इस प्रकार, सभी क्रियाएं ऋण का पुनर्भुगतान बन जाती हैं और व्यक्ति कार्यों के लिए किसी भी मकसद से मुक्त अनुभव करता है।

2. पुरस्कारों के प्रति उदासीनता: एक ‘कर्म योगी’ यह पहचानने में सक्षम है कि आत्मा शाश्वत है, जबकि हमारे अपने भौतिक शरीर सहित, हमारे चारों ओर सब कुछ क्षणिक है। इस ज्ञान के साथ भेदभाव व आत्मा के साथ पहचान करने में सक्षम होने से कर्मयोगी के कार्य अधिक सहज होते हैं और भौतिक पुरस्कार या मान्यता के लिए वे किसी अपेक्षा से प्रेरित नहीं होते हैं।

3. समभाव: गीता के अध्याय 2 के श्लोक 14 में कहा गया है कि हमारी इंद्रियां भौतिक संसार के साथ बातचीत करती हैं और इससे हमारे मन में सुख या दुख की धारणा बनती है। जब कोई अपना कर्त्तव्य मन पर पूर्ण नियंत्रण के साथ करता है, तो वह परिणामों की इच्छा से खुद को अलग कर लेता है। इस प्रकार वह अपने मस्तिष्क के तंत्र में ‘सभी शारीरिक और मानसिक गड़बड़ी के प्रति समानता या लचीलेपन की भावना’ विकसित करता है।

एक शोध में शोधकर्ता अरुण कुमार और संजय कुमार कहते हैं कि अपेक्षित परिणामों की आसक्ति या इच्छा के साथ काम करने से ‘तनाव, प्रतिस्पर्धा और आक्रामकता’ विकसित होती है, जो आगे चलकर अवसाद, हृदय रोग, या यहां तक कि आत्महत्या जैसे गंभीर परिणाम प्रस्तुत करती है। लेखकों ने भगवद्गीता को ‘संकट हस्तक्षेप मनोचिकित्सा का संभवत: पहला रेकॉर्ड किया गया प्रमाण’ बताया है। उनका प्रस्ताव है कि कर्म योग ‘चिकित्सीय तनाव, चिंता और आशंका को कम करने के लिए चिकित्सीय पद्धति के रूप में कार्य कर सकता है, जिससे मनोरोग और इससे संबंधित चिकित्सीय मुद्दों से जुड़ी रुग्णता को कम किया जा सकता है।’