30 मई 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जयंती: जनभावना के साथ रहना अखबार का परम कर्त्तव्य है…

राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश की आज जयंती है। निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने जनसरोकार आधारित पत्रकारिता की जो राह दिखाई, उस पर चलते हुए पत्रिका ने पाठकों के बीच पैठ तो बनाई ही, उनका विश्वास भी हासिल किया है।

4 min read
Google source verification
kulish_ji.jpg

जनभावना के साथ रहना अखबार का परम कर्त्तव्य है...प्रथम आवश्यकता है। अखबार के लिए पाठक ही सर्वेसर्वा है... पाठक ही सब कुछ है।
(कुलिश जी के आत्मकथ्य 'धाराप्रवाह' से)

राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश की आज जयंती है। निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने जनसरोकार आधारित पत्रकारिता की जो राह दिखाई, उस पर चलते हुए पत्रिका ने पाठकों के बीच पैठ तो बनाई ही, उनका विश्वास भी हासिल किया है। अपने पितृ पुरुष को उनकी जयंती पर याद करते हुए राजस्थान पत्रिका में समय-समय पर कुलिश जी के लिखे अग्रलेख व आलेखों के चुने हुए अंश यहां प्रकाशित कर रहे हैं। आलेख में कही गई बातें आज के दौर में भी सामयिक और मनन करने योग्य हैं।

विचारहीनता
स्वाधीनता के बाद हमारे देश का अब तक का अनुभव रहा है कि विचारहीनता को ही विचारधारा के नाम पर धकेला जा रहा है और नारों के कोलाहल में विचार को योजनापूर्वक दबाया जा रहा है। देश के नेतृत्व की दूसरी कमी यह रही कि वह कामचलाऊ दृष्टिकोण से ग्रस्त रहा है। हमने कभी यह नहीं सोचा कि आज के फैसलों का दूरगामी परिणाम कल क्या होगा? यह कामचलाऊ दृष्टिकोण दैनिक मजदूरी करने वाले मजदूर जैसा रहा है जो केवल आज की फिक्र करता है और दिन पूरा होते ही फिर श्रमबाजार में जाकर खड़ा हो जाता है। लोकभाषा में इसे दानक्या (एक दिन काम करने वाला) और इसी को 'डेलीवेज अर्नर' अंग्रेजी में कहा जाता है। प्रत्येक नेता यह सोचता है कि उसका कार्यकाल सही सलामत निकल जाए। अपने को केन्द्र मानकर चलना और देश को धु्रव मानकर चलना अलग-अलग चीजें हैं।
(29 अगस्त 1990 को 'आरक्षण की विनाशकारी घोषणा' शीर्षक से प्रकाशित आलेख में)

चुनाव घोषणा पत्र को अमल में लाएं
राज्य में स्थापित होने वाले मंत्रिमंडल से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह अपनी पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र को अमल में लाए। इससे अधिक किसी सरकार से कोई अपेक्षा नहीं करेगा। घोषणा पत्र को पूरा करने में हमारा पूरा समर्थन होगा और उससे विचलित होने या शिथिलता दिखाने पर जनमत को जगाने में यह कलम सबसे आगे होगी। पार्टी के घोषणा पत्र को पूरा करने के लिए मंत्रिमंडल का गठन करते समय पूरी—पूरी सावधानी बरती जाए। आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से मंत्रिमंडल में नियुक्तियां तो होंगी ही किन्तु गतिशील और वेगवान छात्र और श्रमशक्ति से व्यवहार करने वाला मंत्री सोच-समझकर लिया जाए यह जरूरी है। इस मामले में दलगत राजनीति से हटकर भी विचार किया जा सकता है। यही वक्त का तकाजा है। दलगत हितों के साथ-साथ राज्य के व्यापक हितों का भी ध्यान रखा जाए। कोई कारण नहीं कि सरकार अपनी मंजिल तय नहीं करे। शुभकामनाएं।
(22 जून, 1977 को राजस्थान में पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के शपथ लेने के मौके पर प्रकाशित अग्रलेख में। )

विरासत की राजनीति
श्रीमती गांधी ने देश की जो सेवाएं की उसे युग—युग तक याद किया जाएगा। उनका सबसे बड़ा योगदान देश की राजनीति को स्थायित्व प्रदान करना, विदेशों में भारत के वर्चस्व को बढ़ाना, सत्तारूढ़ दल को एक सूत्र में बांधे रखना और वैज्ञानिक युग में अग्रसर करना है। 1973 में परमाणु विस्फोट करके उन्होंने दुनिया भर में तहलका मचा दिया था। इससे पहले पूर्वी पाकिस्तान में जनक्रांति को मूर्त रूप देने में अभूतपूर्व साहसिकता एवं बुद्धिमता का परिचय दिया। श्रीमती गांधी को राजनीति भले ही विरासत में मिली हो परन्तु उसे बनाए रखना और बढ़ाकर दिखाना उनका अपना ही पराक्रम था। इतिहास में ऐसे बहुत कम प्रखर व्यक्तित्व पढऩे में आते हैं। यहां यह कहना असंगत या अरुचिपूर्ण नहीं माना जाए कि नए प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था पर नए सिरे से विचार किया जाए। मौजूदा गुप्तचर एवं सुरक्षा के भरोसे अब नहीं रहा जा सकता।
(01 नवंबर, 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 'अनभ्र वज्रपात' शीर्षक से प्रकाशित अग्रलेख में )

सहज प्रकट नहीं होते मतदाता के भाव
मतदान में केवल बारह दिन शेष है परंतु वातावरण में वह रंगीनी व हलचल नजर नहीं आती और चुनाव प्रचार में वैसी सरगर्मी देखने में नहीं आती जैसी आमचुनावों में बहुधा देखने में आती रही है। इसका कारण तो यह माना जा सकता है कि ये चुनाव अप्रत्याशित रूप से हो रहे हैं जिसके लिए मतदाता का मानस तैयार ही नहीं था। इसका कारण यह भी हो सकता है कि पेट्रोल-डीजल, कागज, मोटरों और मजदूरी के भाव बहुत बढ़ गए हैं। उम्मीदवार सोच समझकर अपने बजट का उपयोग कर रहे हैं। तीसरा कारण देशव्यापी अकाल भी समझा जा सकता है। और यह भी कि चुनाव मार्च में होने के बजाए जनवरी में कड़ाके की सर्दी में हो रहे हैं। कुछ राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि इन चुनावों में मतदाताओंं क रुचि बहुत कम है और वे उदासीन हैं। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि पिछले कुछ महीनों में अवांछित राजनीतिक उथल-पुथल के कारण मतदाता का मानस मन्थन प्रक्रिया से गुजर रहा है। मतदाता सहज ही अपने भाव प्रकट नहीं करना चाहता।
(23 दिसंबर, 1979 : वर्ष 1980 के आम चुनावों में मतदाताओं के मानस को लेकर प्रकाशित आलेख में। )

पूरे समाज को उठाने का उद्यम
यह भी कहा जा सकता है, और सच ही कहा जाएगा कि हिन्दू समाज छुआछूत और जातिप्रथा की बुराई से ग्रस्त है। परन्तु उसका उपचार समाज को बिखेरना नहीं हो सकता। यह भी ऐतिहासिक सच्चाई ही है कि हिन्दू समाज को ही इन बुराइयों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह देश लगभग एक हजार साल तक गुलाम रहा। किसी विदेशी का तो यह जिम्मा नहीं है कि वह हमारे समाज को उठाए। देश अब स्वतंत्र है और पिछले 43 सालों से जो एक मात्र उद्यम हुआ वह चंद नौकरियां और पदवियां देने का हुआ। यही हाल मंडल आयोग की रिपोर्ट का होगा। किसी भी जाति या वर्ग को समाज की सामान्य व्यवस्था में विशेष बनाने पर टूटन और कलह ही होगा। जब तक पूरे समाज को ऊंचा उठाने का उद्यम नहीं होगा, हम कहीं नहीं पहुंच सकते।
(02 नवंबर 1990 को 'मण्डल' भी 'हिन्दू' की तरह हौव्वा बन गया शीर्षक से प्रकाशित आलेख में)