
जब कभी हम राजा और प्रजा की फोटू एक साथ देखते हैं हमारी रीढ़ की हड्डी में झुरझुरी दौड़ जाती है। अब आप यह न कहना कि हमारे रीढ़ की हड्डी है ही नहीं, क्योंकि आपने जब भी हमें देखा है झुके हुए ही देखा है।
दरअसल हमारे झुके रहने के तीन-चार कारण हैं—एक तो हमारे बापू, दूसरा हमारा पेशा और तीसरा हमारा दिमाग। हमारे बापू ने बचपन से ही हमें सीख दी कि फलदार पेड़ झुका हुआ होता है।
एक फ्रीलांसर को विनम्रता से झुककर काम लेना चाहिए और दिमाग कहता है कि अगर घमंडी, मूर्ख झुक जाने से ही प्रसन्न होते हों तो अपने बाप का क्या जाता है। इसलिए यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि हमारे रीढ़ की हड्डी है और हड्डी है तो उसमें झुरझुरी होगी ही। दरअसल राजा और प्रजा की तस्वीर एक साथ देख कर हम चौंक पड़ते हैं।
क्या खरबूजे और चाकू में मित्रता हो सकती है? चाहे चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर, दोनों ही मामलों में कटना खरबूजे को ही पड़ता है। इधर चुनाव आ रहे हैं और आजकल नेतागण यानी आधुनिक राजा, वोटर यानी प्रजा के घर धड़ल्ले से जा रहे हैं। कोई वहां रात्रि विश्राम कर रहा है, कोई उनके साथ खाट पर बैठ कर शरबत शिकंजी पी रहा है, कोई-कोई तो उनके चौके में बैठ कर रोटी खा रहा है।
यह दृश्य हमें विचलित करते हैं क्योंकि यह दृश्य स्थायी नहीं, अस्थायी हैं। अब हम नाम लेकर किसी को चिढ़ाना नहीं चाहते, लेकिन भूतकाल की घटनाओं को याद कर लीजिए। कितने नेता कितनी तरह की वस्त्रावली पहन कर "प्रजा" के घर गए। उनके साथ चाय पी, उनकी रोटी खाई पर इससे प्रजा का क्या भला हुआ?
आजकल के ज्ञानी कहते हैं कि वर्तमान की राजनीति का पहला उसूल है कि राजा (नेता) को प्रजा के बीच अपनी छवि चमकाए रखना बहुत जरूरी है। पता नहीं प्रजा इस चालाकी को कब समझेगी। कभी-कभी तो लगता है कि प्रजा समझ रही है और कभी लगता है कि वह सब कुछ समझ कर भी नासमझ बनी रहना चाहती है। बस इसीलिए हमें झुरझुरी छूट जाती है।
- राही
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