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1980 से 2019 तक के कश्मीर की कहानी

कितने गाजी आए, कितने गाजी गए: अनुच्छेद 370 हटाने का उद्देश्य था आर्थिक व सामाजिक बहाली

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Nitin Kumar

Nov 27, 2023

1980 से 2019 तक के कश्मीर की कहानी

1980 से 2019 तक के कश्मीर की कहानी

अरुण जोशी
दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार
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‘कितने गाजी आए, कितने गाजी गए’ शीर्षक वाली किताब लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) के.जे.एस. ढिल्लों द्वारा कलमबद्ध की गई कश्मीर की अनकही कहानियों की गाथा है। इसमें उन्होंने फरवरी से अगस्त 2019 के बीच कश्मीर के गंभीर हालात को अपने नजरिये से व्यक्त किया है। 14 फरवरी 2019 को हुए पुलवामा हमले ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था और कश्मीर को अफगानिस्तान, पाकिस्तान व सीरिया जैसे संवेदनशील स्थानों की सूची में ला खड़ा किया था। इसी वर्ष 5 अगस्त को संविधान के अनुच्छेद 370 की समाप्ति से पहले और बाद की कहानी इस किताब का मुख्य अंश है।
पुलवामा आतंकी हमले में आजमाए गए सारे आतंकी मॉड्यूल को 100 घंटे में विफल कर दिया गया। इस दौरान कामरान उर्फ गाजी भी मारा गया। किताब का शीर्षक इसी गाजी से लिया गया है। हाल ही में उनसे किताब को लेकर लंबी बातचीत हुई। उन्होंने अपने करियर के बारे में भी विस्तार से बताया, खास तौर पर 15 कोर के कोर कमांडर के रूप में अपने कार्यकाल को लेकर। इसे चिनार कोर भी कहा जाता है, जिसके जवानों पर उत्तर-पश्चिम में नियंत्रण रेखा पर अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों की जिम्मेदारी है। इस कोर ने पिछले तीस सालों में आतंक के हर रूप से मुकाबला किया है। इस किताब का प्रकाशन ंपहले फरवरी 2023 में अंग्रेजी भाषा में हुआ था, और अब नवंबर 2023 में इसका हिन्दी संस्करण प्रकाशित हुआ है।
ढिल्लों कहते हैं, ‘14 फरवरी 2019 का आतंकी हमला असाधारण था, क्योंकि कश्मीर में आम तौर पर ऐसे आतंकी हमले नहीं होते थे। इसलिए हमने दुखी होकर इस हमले में शामिल लोगों का खात्मा करने का तय किया। खुफिया एजेंसियों से मिली जानकारियों के आधार पर कार्रवाई करते हुए हमने 100 घंटों के भीतर हमले में लिप्त सभी आतंकियों को खत्म कर दिया। इनमें से एक था-कामरान उर्फ गाजी। 100 घंटे के ऑपरेशन के बाद बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुझ से इसी गाजी पंथ के बारे में सवाल किया गया तो मेरा जवाब था - ‘कितने गाजी आए, कितने गाजी गए।’ यही मेरी किताब का शीर्षक बना और यह कहानी शुरू हुई।
कोर के कट्टर जवान होने के बावजूद ढिल्लों की किताब में कश्मीर के हालात को समग्र रूप से एक अलग परिप्रेक्ष्य के साथ प्रस्तुत किया गया है। वे मानते हैं कि ‘कश्मीर में न सैन्य समस्या है न ही आतंकवाद की। यह समस्या है आतंकवाद से जनता के प्रभावित होने की। आतंकवाद ने इनका जीवन बुरी तरह से प्रभावित किया, इनसे रोजमर्रा की जिंदगी का सुकून छीन लिया। बम की आवाजों और आतंकियों की बंदूकों ने आम जनता को उनके कामकाज से दूर कर दिया, स्कूल जला दिए गए, आर्थिक गतिविधियां थम गईं। इसलिए जरूरी हो गया था कि जनता को स्थायी शांति मिले।’
1980 में जब ढिल्लों ने भारतीय सेना के कैप्टन के रूप में कश्मीर की धरती पर कदम रखा था तब उन्होंने पता लगाया कि आतंकवादियों ने किस प्रकार ग्रामीण व दूरदराज के इलाकों में स्कूलों को निशाना बनाया। ईंट व लकड़ी से बने स्कूलों को जलाया और बच्चों के पास कोई ठिकाना नहीं रहा। यह संकट काफी भयावह था, क्योंकि कश्मीरी पंडितों को पहले ही निकाला जा चुका था, जो कश्मीर में शिक्षा तंत्र की रीढ़ की हड्डी थे। इनमें से अधिकतर ऐसे थे, जिन्हें सर्वश्रेष्ठ शिक्षक कहा जाता था। इससे शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां (एमएनसी) हिंसाग्रस्त क्षेत्र में निवेश की अनिच्छुक थीं और जो कारखाने पहले से थे, वे भी बंद कर दिए गए। जैसे एचएमटी की फैक्ट्री का बंद होना। इस हताशा भरे माहौल में निराश युवा भटक कर उग्रवाद के रास्ते पर चल पड़े।
किताब में घटनाओं को समयानुसार कालक्रम में पिरोया गया है। इनमें बम व बंदूक से लेकर हुर्रियत के बंद के आह्वानों और बंद की घटनाएं शामिल हैं।
यह किताब कश्मीर के इतिहास के विभिन्न चरणों की संदर्भ पुस्तिका कही जा सकती है। खास तौर पर,1980 से। गृह मंत्री अमित शाह के साथ जून में हुई अपनी बैठक याद करते हुए वे बताते हैं कि अनुच्छेद 370 हटाने और घाटी में इसके प्रभाव के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा था - ‘अगर इतिहास लिखना है तो किसी को इतिहास बनाना पड़ेगा।’ इसी विचार के साथ विवादास्पद अनुच्छेद को हटाने की शुरुआत हुई, जो वास्तव में एक प्रशासनिक प्रावधान था, न कि कोई प्रोपेगेंडा। अनुच्छेद 370 हटाए जाने का मुख्य उद्देश्य था शांति, आर्थिक व सामाजिक बहाली के युग का सूत्रपात। अनुच्छेद 370 हटाने का कदम सही ही साबित हुआ, क्योंकि शांति का सूर्योदय हुआ है, जिसके परिणाम पर्यटन, नियमित एवं सामान्य जीवन की बहाली के रूप में सामने आए हैं। अकादमिक सत्र चालू हो चुके हैं और पत्थरबाजी पर रोक लग चुकी है। इससे कश्मीर में आम जनजीवन सुगम हो गया है।
किताब में उल्लिखित एक प्रसिद्ध कथन प्रत्येक व्यक्ति को याद दिलाता है कि भारतीय सेना किस बात के लिए जानी जाती है। यह है-‘सेना में होना नौकरी करना नहीं है, यह कभी न खत्म होने वाले प्रेम की तरह है। जहां केवल किंवदंतियां हैं, चुनौतियां नहीं।’