
ट्रैवलॉग अपनी दुनिया : दुर्गा पूजा का जादू और रंगों में डूबा कोलकाता
तृप्ति पाण्डेय , (पर्यटन एवं संस्कृति विशेषज्ञ)
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
दुर्गा स्तुति का यह श्लोक बचपन से कानों में गूंजता रहा! मां का नाम भगवती था और शायद उनके नाम ही ने उनके मन में देवी दुर्गा के लिए इतनी गहरी आस्था पैदा कर दी थी। दोनों नवरात्रों में वे नौ दिन का पाठ करती थीं और उन्हीं दिनों में एक बार हम शिला देवी के मंदिर जाते थे। थोड़े बड़े होने पर दुर्गा बाड़ी का नाम सुना, जहां बंगाली लोग शारदीय दुर्गा पूजा का उत्सव मानते थे। बाद में हमने अपने घर के पास के एक बड़े बाग में हर साल प्रवासी बंगालियों के पूजा मेले को देखा जहां प्रोफेसर और बैंक अफसरों से लेकर मजदूर तक मां के आगमन का उत्सव मनाते हैं। हम भी कई बार संधि पूजा और पुष्पांजलि के लिए गए। मां दुर्गा की विदाई वाले दिन जब पहली बार 'सिंदूर खेला' देखा तो लगा कि बंगलियों की होली-दिवाली सब ये शारदीय पूजा है। तब तय किया कि एक बार तो कोलकाता की दुर्गा पूजा देखनी है।
चार साल पहले जब अमरीका से एक मित्र भारत आईं तो कोलकाता पार्क स्ट्रीट पर रहने वाली एक और मित्र के साथ पूजा देखने का कार्यक्रम बनाया। आश्चर्य की बात यह कि उन्होंने खुद कभी ऐसी पूजा नहीं देखी थी जैसी उन्होंने हमारे साथ देखी।
दुर्गा पूजा के भव्य मंडप, जिन्हें वहां 'पेंडल' कहते हैं, समुदायों के साथ बड़ी कंपनियों के विज्ञापनों के सहयोग से बनाए जाते हैं। यह बात मुझे मालूम थी, इसलिए विज्ञापन जगत से जुड़े अपने भाई पीयूष की मदद ली। फिर एक सुबह पुराने शहर के शाही घरों की दुर्गा पूजा देखने के लिए एक ट्रैवल एजेंट के साथ टिकट खरीदे। जब प्रवेश-पत्रों की छपी पुस्तिका हमारे हाथ में आई तो लगा कि इतने पंडाल हम देख भी पाएंगे कि नहीं। हमने एक सूची बनाई और सुबह होते ही निकल पड़े। ये 'सरबोजनिन' यानी कि सार्वजनिक पूजा स्थल सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि कला और रचनात्मक सोच से परिचय कराने का तरीका है। हर पंडाल किसी खास विषय को ले कर बनाया जाता है जो आज का भी हो सकता है, पुराना भी, तो कोई विदेश का भी। 2017 में एक ओर मेगा हिट फिल्म बाहुबली का माहिषमती का भव्य महल था तो दूसरी ओर इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ का बकिंघम महल, और दोनों में विराजमान देवी दुर्गा।
मन में बार-बार एक प्रश्न आ रहा था कि ऐसे भव्य आयोजन की शुरुआत कब और किसने की थी? इसका उत्तर मुझे पुराने शहर को पैदल घुमाते समय हमारे पथ प्रदर्शक ने दिया। हम सुबह होते ही सोवा बाजार गए। वहां कोलकाता के पुराने शाही घर हैं जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है राजबाड़ी। यह भव्य भवन राजा नबकृष्ण देब ने सन् 1700 में बनवाया था। कहा जाता है कि उन्होंने नवाब सिराज-उद-दौला के साथ लड़े प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की मदद की और नवाब की हार के बाद महल में पहली बार भव्य दुर्गा पूजा का आयोजन किया। सर वारेन हेस्टिंग्स और लॉर्ड क्लाइव को भी आमंत्रित किया। राजबाड़ी के सामने ही है छोटो राजबाड़ी, जहां आमजन पूजा के दिनों में ही अंदर जा सकते हैं।
सामूहिक पूजा मनाने का श्रेय गुप्तिपारा के उन बारह दोस्तों को दिया जाता है जिन्होंने 1790 में चंदा इक_ा कर के लोगों के लिए आयोजन किया और नाम दिया 'बारोह यारी'। इसी से 'सरबोजनिन' या सार्वजनिक पूजा का जन्म हुआ। कोलकाता से लौटने के बाद मैं हर साल पूजा की जानकारी लेती हूं। इस साल की सबसे बड़ी घटना होगी जब पहली बार महिला पुरोहित पूजा करेंगी। दुबई की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा भी बड़ा आकर्षण होगी। एक पंडाल किसान आंदोलन को भी दर्शाएगा। दुर्गा पूजा को कोलकाता में देखना या कोलकाता को दुर्गा पूजा में देखना एक यादगार अनुभव है।
Published on:
12 Oct 2021 11:20 am
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