खेल कोटे के नाम पर सामने आया यह गड़बड़झाला कई स्तरों पर गंभीर है। तीरंदाजी से लेकर बॉक्सिंग, कबड्डी, फुटबॉल, जूडो, वॉलीबॉल… लगभग हर खेल में ऐसे आवेदन मिले, जो ‘फर्जीवाड़े’ की श्रेणी में आते हैं। यहां सिर्फ अभ्यर्थियों पर अंगुली उठाना ही पर्याप्त नहीं है। प्रश्न यह भी उठता है कि इतने समय तक ऐसे प्रमाण-पत्र बिना सत्यापन के कैसे बनते और चलते रहे? क्या संबंधित खेल संघों और प्रमाण जारी करने वाली संस्थाओं का भी ऑडिट नहीं होना चाहिए? क्योंकि फर्जी प्रमाण-पत्र तभी बनते हैं, जब सिस्टम में कहीं न कहीं ढील या मिलीभगत रहती है।