
कानूनों का निर्माण हो या उनकी पालना वहां किन्तु-परन्तु के लिए कोई जगह नहीं होती। इन मामलों में जहां भी किन्तु-परन्तु आता है, उनकी भावना कमजोर हो जाती है फिर परिणाम प्राप्त होने का तो सवाल ही नहीं होता। कानून जितना सीधा, सरल और लक्ष्यभेदी होगा, परिणाम उतनी ही आसानी और शीघ्रता से प्राप्त होगा। उदाहरण के लिए महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ और दुराचार। पहले ही हमारे यहां कानून कम नहीं थे। लेकिन निर्भया मामले के बाद उसमें परिवर्तन किए गए। सजा को और कड़ा किया गया। फांसी तक की सजा का उसमें प्रावधान किया गया।
अब मध्यप्रदेश ने बारह साल तक की बच्चियों के साथ बलात्कार अथवा सामूहिक बलात्कार के दोषियों को फांसी तक की सजा विधेयक पारित किया है। मूल प्रश्न नित नए कानून बनाने का नहीं है। सवाल है, उनके क्रियान्वयन का। जब कानून के उल्लंघन के किसी भी मामले में तुरन्त सजा नहीं मिलती, तब दोषियों के हौंसले बुलंद होते जाते हैं। जब उसमें बचने के रास्ते होते हैं तो दोषी उनका लाभ लेने की कोशिश करता है। कई मौकों पर उसमें कामयाब भी हो जाता है। उदाहरण के लिए निर्भया का ही मामला ले लें।
वर्ष २०१२ की सर्दियों में हुए इस मामले के आरोपी दोषी ठहराए जाने के बाद भी आज तक अपीलों में घूम रहे हैं। दया याचिकाओं की तैयारी कर रहे हैं। एक और दलबदल कानून का जिक्र करना भी यहां अप्रासंगिक नहीं होगा। तीस साल पहले दलबदल को रोकने के लिए यह कानून बना और स्वयं ही दांव-पेचों में फंस गया। उसकी मूल भावना दलबदल को रोकने की थी लेकिन आज तो पहले से ज्यादा दलबदल होने लगे। क्यों? कारण साफ है कि कानून बनते-बनते उसकी मूल भावना ही गायब हो गई।
आज न्यायालय से लेकर चुनाव आयोग तक सबकी नजरों के सामने दलबदल हो जाते हैं। सब देखते रह जाते हैं। यही हाल निर्भया कानून का हुआ। तब बड़ा सवाल यह है कि, नित नए कानूनों का निर्माण जरूरी है अथवा उनका क्रियान्वयन। आज भी हमारे पास जितने कानून है, केवल उनका ठोस क्रियान्वयन हो जाए तो बलात्कार की घटनाओं को रोका जा सकता है, कम किया जा सकता है। समयबद्ध निर्णय इसमें सबसे महत्वपूर्ण है।

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