
युवाओं के कौशल की सुगंध को महसूस करना सीखें
अजहर हाशमी
कवि, साहित्यकार और स्तम्भकार
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दौर कोई भी हो, युवा पीढ़ी ने अपने जोर से दौर बदला है। कला का क्षेत्र हो या विज्ञान का, क्रीड़ा का क्षेत्र हो या ध्यान का। युवा पीढ़ी ने साहस की स्याही और कर्म की कलम से उपलब्धियों की इबारत लिखी है। यद्यपि हर युग में युवा पीढ़ी के सामने प्रश्नों के पर्वत खड़े किए गए हैं तथापि अपनी प्रतिभा, कौशल और पुरुषार्थ से युवाओं ने ये पर्वत लांघकर निंदकों को निरुत्तर कर दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जब युवाओं को योग्यता होने के बावजूद औचित्य नहीं मिलता, प्रतिभा और कौशल के बावजूद प्रतिसाद प्राप्त नहीं होता, परिश्रम के बावजूद पुरस्कार नसीब नहीं होता यानी जब पैसा और पॉवर जीत जाते हैं तथा काबिलियत और कर्मठता हार जाते हैं तब युवा पीढ़ी अवसादग्रस्त हो जाती है। लेकिन शीघ्र ही नए जोश और जज्बे के साथ वह अवसाद को अंगूठा दिखा देती है।
जैसे ‘फीनिक्स’ पक्षी के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी ही राख से दोबारा जन्म ले लेता है, ठीक वैसा ही मामला युवा पीढ़ी का है। वर्तमान का जो परिदृश्य है उसमें दिखाई दे रहा है कि युवा पीढ़ी अपेक्षित सफलता नहीं मिलने पर कुछ दिन अनमनी रहती है लेकिन अवसाद के अंधेरे में पुन: प्रेरणा का प्रकाश खोज लेती है तथा नए सिरे से सामर्थ्य और साहस के साथ लक्ष्य प्राप्ति के लिए जुट जाती है। युवा पीढ़ी का यह सामथ्र्य प्रभावित करता है और साहस अभिभूत करता है। मेरे मत में युवा पीढ़ी दरअसल चुनौती के लिए चुनौती, बाधा के लिए बाधा, कठिनाई के लिए कठिनाई होती है। संकट के सैलाब में जीवट से जूझ कर सुरक्षित तट पर पहुंचने का नाम ही युवा पीढ़ी है। युवा पीढ़ी का जज्बा और जीवट ही देश के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र से लेकर हर क्षेत्र और इंडस्ट्री में इतिहास रच रहा है। आइआइटी और आइआइएम ही नहीं, आइआइआइटी के युवा छात्र भी अपने कौशल से मीडिया की ‘सुर्खियां’ बटोर रहे हैं। विश्व की प्रतिष्ठित कंपनियां उनके सामथ्र्य को सराह रही हैं और अपूर्व सैलरी पैकेज ऑफर कर रही हैं - फिर चाहे आइआइआइटी-प्रयागराज के प्रथम प्रकाश गुप्ता हों और चाहे आइआइआइटी-नया रायपुर की राशि बग्गा।
इससे सिद्ध होता है कि भारतीय युवा पीढ़ी में प्रतिभा और कौशल ठीक वैसे ही है जैसे कि पुष्प में सुगंध। आवश्यकता है इस सुगंध को महसूस करने वाली नाक की। जिस नाक ने इस सुगंध को महसूस किया वह थी विदेश की। हमारे यहां भी नाक तो हैं लेकिन वे युवा प्रतिभा की सुगंध को महसूस करने की बजाय ‘नाक-भौं’ ‘सिकोड़ती’ हैं। कुछ लोग तो ऐसे हैं जो युवाओं में केवल दोष ही देखते हैं। माना कि इंटरनेट और लैपटॉप के इस युग में युवा पीढ़ी ‘साइबर एडिक्ट’ होकर थोड़ा-सा डगमगाई है लेकिन यह हमारा दायित्व है कि हम युवाओं की रचनाशीलता को रवानी दें ताकि वे अपनी ऊर्जा से विकास की नई कहानी लिख सकें। किसी कवि की युवा पीढ़ी के बारे में ये काव्य-पंक्तियां उल्लेखनीय हैं: ‘यह सागर की लहरों की रवानी ही तो है/ रचना की पगडंडी की कहानी ही तो है/ डगमगाए तो संभालो, कोसो न इसे/ डगमगाएगी आखिर जवानी ही तो है।’ इतिहास इस बात का साक्षी है कि युवा पीढ़ी को जूझना हर दौर में पड़ा और संदेह का सदंहे का सलीब हर युग में ढोना पड़ा। लेकिन उसी बात पर मैं वापस आता हूं कि युवा पीढ़ी हर काल में चुनौती के लिए चुनौती बनी। जैसे त्रेता युग में युवा लक्ष्मण ने परशुराम को चुनौती दी, द्वापर युग में महाभारत काल में युवा अभिमन्यु ने चक्रव्यूह की चुनौती को स्वीकारा और अपने दम से महारथियों की नाक में दम कर दिया। वर्तमान दौर में तो युवा पीढ़ी पग-प्रति-पग पल-प्रति-पल चुनौतियों की चट्टानों को अपने हौसले के हथौड़े से तोड़ने का कार्य कर रही है। इसलिए आज जरूरत है कि हम युवाओं को प्रेरणा दें, प्रताड़ना नहीं।
वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जुलाई को विश्व युवा कौशल दिवस के रूप में इसलिए घोषित किया था ताकि दुनिया भर में युवाओं को रोजगार, सभ्य कार्य और उद्यमिता के लिए कौशल से लैस करने के रणनीतिक महत्त्व को समझा जा सके। विश्व युवा कौशल दिवस 2023 का विषय परिवर्तनकारी भविष्य के लिए शिक्षकों, प्रशिक्षकों और युवाओं को कुशल बनाना है। यह उस आवश्यक भूमिका पर प्रकाश डालता है जो युवाओं के श्रम बाजार में स्थानांतरण और अपने समुदायों और समाजों में सक्रिय भागीदारी के लिए उन्हें कौशल प्रदान करने में शिक्षक, प्रशिक्षक और शिक्षण कार्य से जुड़े अन्य लोग निभाते हैं।
Published on:
14 Jul 2023 09:06 pm
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