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पूरे देश को सोने की उपज देने वाले पंजाब और हरियाणा कैंसर से सहम उठे। वहां से रोज कैंसर ट्रेन बीकानेर आ रही है। सोने की उपज पंजाब से श्रीगंगानगर आई, हनुमानगढ़ आई और यहां से भी कैंसर ट्रेन निकल पड़ी। मारवाड़ से अनाज मंगवा रहे हैं, वहां के लोग। उनको शायद पता ही नहीं कि अधमरी जनता को पूरी तरह मारने का पुख्ता इंतजाम, अर्थात् सामूहिक आत्महत्या का प्रारूप राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात जैसे बड़े-बड़े राज्यों ने कर डाला है। आने वाले समय में कैंसर अस्पतालों और कैंसर ट्रेनों का जाल बिछा होगा।
नेता किसानों को वोट बैंक मानते हैं। कृषि में आयकर नहीं लगता। किसानों को सब्सिडी देकर असली समस्याओं को किनारे कर दिया। सब्सिडी रासायनिक खाद पर दी गई। जैविक खाद को पिछड़ा मान लिया गया। उधर पशुओं में दुग्ध वृद्धि के लिए ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन दे रहे हैं। पशुओं को जो चारा खिलाया जा रहा है, वह भी तो कीटनाशकयुक्त ही है। उसी का परिणाम तो अनाज को कैंसर का पोषक बना रहा है। आज का यक्ष प्रश्न है कि क्या अधिक महत्वपूर्ण है- जीवन या धन (अधिक दूध अथवा पैदावार)? आज तो किसी को मरने की चिंता ही नहीं है। मानो जीवन बाजार में मिलता होगा।
पाठकों को याद होगा कि राजस्थान पत्रिका ने सन् २००४ में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि किस प्रकार आधुनिक कृषि क्षेत्र (श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़) में सब्जी, फल, अनाज, मिट्टी से लेकर माताओं के दूध तक में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए हैं। चुनावी रणनीति ने गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में ‘रुपए किलो कैंसर’ बांटना शुरू कर दिया था। घर-घर तक कैंसर का प्रसार किया जा रहा है। सरकारें ही इस कैंसरयुक्त अनाज को खरीद कर लोगों में बंटवा रही हैं। वरना, कोई नहीं खरीदने वाला। स्तन कैंसर ने तो नारी सशक्तीकरण के नारे की धज्जियां उड़ा दी। अकेले भारत में ही प्रतिदिन ५२७ नए मामले स्तन कैंसर के आते हैं और नित्य ११० की मृत्युदर। भारत में कीटनाशक का वार्षिक उत्पादन ८५,००० टन है। लगता है हमने सामूहिक, स्वैच्छिक मृत्यु का मार्ग पकडऩा ही श्रेष्ठ समझ लिया है।
हम प्रकृति से दूर हो गए। खान-पान भूगोल से कट गया। डिब्बा संस्कृति हमारे विकास का नेतृत्व करने लगी है। इनका एकमात्र कारण है शरीर के प्रति बढ़ता मोह और उसके लिए धन और भौतिक सुखों का बढ़ता महत्व। क्या कोई जादू या वरदान हमें इस कैंसर से मुक्त करा सकता है? विज्ञान कहता है-‘कलियुग के बाद तो प्रलय ही है। मेरे सहयोग के बिना नहीं आ सकती। हां, विकल्प दे सकता हूं। चाहो तो जन्म से पहले ही कैंसर की गोद में बैठ जाओ, (जननी सहित), अथवा पैदा होने के बाद उन कीटनाशकों को सीधा ही भोजन के साथ गले के नीचे उतार लेना। भोजन के जरिए कीटनाशक सम्पूर्ण मानव जाति के पेट में जाते रहेंगे।’ एक अनुमान के अनुसार विश्व में सन् २०३० तक प्रतिवर्ष दो करोड़, बीस लाख नए कैंसर रोगी बढ़ते ही जाएंगे।
प्रश्न यह है कि सरकार की इस योजनाबद्ध ‘सरकारी मृत्यु योजना’ से छुटकारा कैसे मिले? किसी भी प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग स्वस्थ जीवन के लिए योजना नहीं बनाता। खाद्य निरीक्षक इस तथ्य से मस्त हैं कि वे हर खाने की चीज में सफलतापूर्वक मिलावट करवा लेते हैं। पार्कों की जमीनें नेता-अफसर ही नोंच लेते हैं। किसी को स्वास्थ्य लाभ न मिल जाए। शहर में डेयरी नहीं रहेंगी, सब्जियां नहीं उगाई जाएंगी। शहर की फैलावट के साथ दूर से दूर ताजगी का प्रश्न। सप्ताह भर पुराना सड़ा हुआ, कीटनाशकयुक्त दूध मेरी भावी पीढ़ी के भाग्य का निर्माण करेगा। सरकार कैंसर बेचती है। फिर इलाज जानलेवा। यानी सरकार ही मौत की बड़ी सौदागर। हमारी पुरातन जीवन शैली प्राकृतिक, बिना खर्च की, जीवन के प्रति आस्था प्रधान थी। आज विज्ञान के साथ प्रलय की ओर सामूहिक कूच कर रहे हैं देशवासी।
क्या हम विवेक से काम लेने को तैयार हैं। तब जीवन से प्यार करना सीखना पड़ेगा। धन के बजाय सुख को प्राथमिकता देनी होगी। खेती से रासायनिक खाद, कीटनाशक, ऑक्सीटोसिन आदि को बाहर करना पड़ेगा। इनकी छाया भी न पड़े खाद्य सामग्री पर। मौत का सिलसिला ठहर जाएगा। न कर्ज बढ़ेगा, न ही बीमारी। इस कारण तो आत्म-हत्या नहीं करनी पड़ेगी। हां, कम खाना पड़ सकता है। आधा देश (बीपीएल) तो आज भी कम ही खाता है। नई पीढ़ी को जीवनदान मिल जाएगा। आपकी आने वाली सात पीढिय़ां सुखी रहेंगी। पूरा देश आपको आशीर्वाद देगा। नकली दूध, नाले की सब्जियों से मुक्ति मिलेगी और कैंसर को देश निकाला देने की तैयारियां शुरू हो जाएंगी। मरना तो सबको ही है, किन्तु स्वाभिमान से क्यों नहीं! कैंसर की लाचारी से क्यों?

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