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राजनीति में ‘आयाराम-गयाराम’ भी अजीब चीज है। जिसकी आलोचना हर दल जोर-जोर से करता है। लेकिन इसकी तासीर ऐसी है कि इसके बिना उसका गुजारा भी नहीं होता। हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। नामांकन पत्र दाखिल करने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। ऐसे समय हिमाचल प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री अनिल शर्मा ने अपने पिता और पुत्र के साथ कांग्रेस छोडक़र भाजपा का दामन थाम लिया। शर्मा का आरोप है कि कांग्रेस उनके परिवार को नजरंदाज कर रही है। खास बात ये कि पार्टी छोड़ते समय अनिल शर्मा ये बताने से नहीं हिचके कि भाजपा ने उन्हें मंडी सदर सीट से टिकट देने का आश्वासन दिया है।
कल तक भाजपा को कोसने वाले शर्मा को भाजपा ने गले भी लगा लिया। कांग्रेस पार्टी ने अनिल शर्मा ही नहीं उनके पिता सुखराम को भी बहुत कुछ दिया है। पांच बार विधानसभा और तीन बार सांसद बनाने में कांग्रेस का ही योगदान रहा है। पार्टी ने उन्हें केन्द्र में मंत्री भी बनाया। हिमाचल और गुजरात में ‘आयाराम-गयाराम’ का खेल यंू ही चलने की संभावनाएं बताई जा रही हैं। ये पहला मौका नहीं है जब कोई मंत्री पार्टी छोड़ किसी दूसरे दल में गया हो। हर चुनाव में दल-बदलुओं की नई जमात देश के सामने आती है। एक-एक सीट जीतने के लिए हर दल दलबदलू पर न सिर्फ दांव लगाता है बल्कि उसकी शान में कसीदे पढऩे से भी परहेज नहीं करता। भाजपा इन दिनों अपने आपको दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बताने लगी है। दस करोड़ से अधिक सदस्य होने का दावा भी करती है।
उसका दावा सही भी हो सकता है तो फिर सवाल क्यों नहीं उठना चाहिए कि इतनी बड़ी पार्टी के पास क्या चुनाव लडऩे और जीतने लायक समर्पित कार्यकर्ता नहीं हैं? और अगर हैं तो उसे दूसरी पार्टी के नेता को टिकट देने का आश्वासन देकर अपनी पार्टी में क्यों शामिल करना चाहिए? इस सवाल का जवाब भाजपा के साथ-साथ तमाम उन दलों को तलाशना चाहिए जो सत्ता पाने के लिए किसी भी नेता को दोस्त से दुश्मन और दुश्मन से दोस्त बनाने में संकोच नहीं करते। अनिल शर्मा सरीखे नेता न किसी के सगे हुए हैं और न होंगे। उन्हें मोह है तो सिर्फ कुर्सी से।
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