
प्रिय! बहुत भारी बोझ तो नहीं लग रहा?" द्रौपदी ने धीरे से पूछा। "एक पुष्पमाला से अधिक बोझ नहीं है तुम्हारा।" अर्जुन ने मधुर ढंग से मुस्कराकर कहा, "तुम्हें उठाकर इतना-सा चलने से यदि थक जाऊंगा तो युद्ध में इतना भारी गांडीव सारा दिन मुझसे कैसे संभाला जाएगा।"
सहसा द्रौपदी ने अपनी नाक बंद कर ली, "कैसी दुर्गन्ध है यह?"
सब जानते थे कि गंध को अनुभव करने की क्षमता द्रौपदी में ही सबसे अधिक थी।
"हां! कुछ है तो।" अर्जुन ने समर्थन किया।
"मेरा तो विचार है कि यह किसी शव के सड़ने की गंध है।" सहदेव ने कहा।
"जाकर देखो तो कि वस्तुत: यह है क्या।" भीम ने कहा।
वे लोग रूक गए।
सहदेव थोड़ी ही देर में लौट आया।
"वन के भीतर यह एक प्रकार का श्मशान ही है।" उसने बताया, "वहां कोई है तो नहीं, पर लगता है कि कभी-कभी लोग आते होंगे और अभिचार करते होंगे। वहां कुछ अपवित्र साधनाओं के प्रमाण हैं।"
"क्या प्रमाण हैं?" अर्जुन ने पूछा।
"एक भयंकर शमी वृक्ष के नीचे अस्थियां इत्यादि हैं सिंदूरपुता एक शव लटक रहा है। कुछ अधगले और अधजले शव भी हैं।" सहदेव बोला, "किसी ने किसी प्रकार की कोई शव-साधना की है। भयंकर दुर्गन्ध है।"
"मेरा विचार है कि अपने शस्त्र छुपाने का यही उचित स्थान है।" अर्जुन ने भीम की ओर देखा।
"ठीक है।" भीम ने उत्तर दिया, "साधारण जन तो इधर आएंगे ही नहीं। एक तो वन है। दूसरे श्मशान का सामीप्य है। इतनी दुर्गध है और अभिचार का भय। इतने सारे कारण एक साथ और कहां मिलेंगे।"
वे लोग शमी वृक्ष की ओर चल पड़े। युधिष्ठिर और द्रौपदी दूर ही बैठ गए। सब ने अपने-अपने धनुष की प्रत्यंचा उतार ली। सारे धनुष एक श्वेत धोती में लपेट दिए गए। खड्गों को और भी सावधानी से लपेटा गया।
नकुल उस शमी वृक्ष पर चढ़ गया। उसने धोती में लिपटे धनुषों का बोझ, शमी की शाखाओं में कुछ इस प्रकार फंसा कर टांग दिया कि दूर से तो वह दिखाई ही न पड़े किंतु कोई निकट आकर बहुत ध्यान से देखे तो उसे लगे कि जैसे कोई लंबा-सा शव सीधा लेटा दिया गया हो। उसके निकट के कुछ कोटरों में विपाठ बाण छिपा दिए और खड्गों को कुछ पतली शाखाओं के साथ इस प्रकार बांध दिया कि वृक्ष के पत्ते उन्हें भली प्रकार ढंक लें।
सबने देखा और संतुष्ट होकर नकुल के कौशल को सराहा।
"अब हम भी अपना वेश बदल लें।" अर्जुन ने कहा। "तुम बदलो, जिसे साड़ी धारण करनी है।" भीम ने जैसे उसे चिढ़ाया, "किसकी साड़ी लाए हो—पांचाली की, अथवा धात्रेयिका की?" "मेरे पास साड़ी कहां है। मैं तो स्वयं धात्रेयिका की साड़ी धारण कर रही हूं।" द्रौपदी बोली, "धनंजय तो सुभद्रा की साड़ी लाए हैं।"
"मैं तो बना बनाया पैरोगव बल्लव हूं।" भीम बोला, "लग ही रहा होगा कि अभी भाड़ के सामने से उठ कर आया हूं। पांचाली! तुम्हें कुछ श्ृंगार तो करना होगा। सैरंध्री बन कर जा रही हो।"
"बन कर तो सैरंध्री ही जा रही हूं; किंतु संकट में हूं। पति पराए देश गए हैं। श्वसुर ने घर से निकाल दिया है। ऎसे में श्ृंगार करके कैसे जाऊंगी।" द्रौपदी ने उत्तर दिया। "मुझे तो भद्र पुरूष बनना है।"
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