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प्रच्छन्न : विजय क्रीड़ा

यह भी तो संभव है महाराज! कि महारानी का व्यवहार भी अपने भाई के प्रेम से नहीं, उसके भय स...

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Super Admin

Jan 16, 2015

यह भी तो संभव है महाराज! कि महारानी का व्यवहार भी अपने भाई के प्रेम से नहीं, उसके भय से ही संचालित होता हो।" युधिष्ठिर ने कहा।
विराट के चेहरे पर कुछ ऎसे भाव थे, जैसे इस पक्ष पर उन्होंने कभी विचार ही न किया हो। "संभव है कि ऎसा ही कुछ हो, किंतु जब तक यह स्थिति है, मैं किसी पर भी विश्वास नहीं कर सकता।"

"आप ठीक कहते हैं महाराज!" युधिष्ठिर बोले, "ऎसी स्थिति में आप द्यूत की पहली चाल के रूप में राजसत्ता के स्थान पर अपनी गृह-सत्ता पर अपना पूर्ण और दृढ़ नियंत्रण स्थापित करने का प्रयत्न करें महाराज! पहले उन स्थानों और विभागों पर अपनी पकड़ कसें, जिन पर कीचक अपने नियंत्रण की आवश्यकता ही न समझता हो।"

"ऎसा कौन-सा स्थान अथवा विभाग हो सकता है कंक?" "यदि आपको अपने प्राणों का भी भय है तो सबसे पहले तो आपको यह प्रबंध करना चाहिए कि आपका भोजन सुरक्षित हो। आपको भोजन में विष न दिया जा सके। अत: पाकशाला में आपके विश्वसनीय लोग होने चाहिए।..." युधिष्ठिर ने विराट पर एक दृष्टि डाली। विराट कुछ ऎसे भाव से उनकी ओर देख रहे थे, जैसे कोई किसी बहुत बड़े संकट की सूचना देने वाले की ओर देखता है।

युधिष्ठिर अपनी बात कहते गए, "पाकशाला कीचक की महत्वाकांक्षा का क्षेत्र नहीं हो सकती। फिर यदि सेना आपके नियंत्रण में नहीं है, तो आप अश्वशाला पर अपना अधिकार स्थापित कीजिए। अश्वों के बिना न रथ चल पाएंगे, न अश्वारोही। समझिए कि आधी सेना आपके अधिकार में हो गई। ऎसे ही...।" युधिष्ठिर मौन हो गए।

विराट ने उन्हें भरपूर प्रशंसा की दृष्टि से देखा, "तुम तो बहुत ही काम के व्यक्ति हो कंक! द्यूतक्रीड़ा के विषय में तो मैं अभी कुछ नहीं कह सकता; किंतु राजनीतिक द्यूत में तो तुम बहुत दक्ष प्रतीत होते हो। ये सारी बातें तो मैंने कभी सोची भी नहीं थी।" वे कुछ रूके और पुन: बोले, "अभी थोड़ी देर पहले जब मैं तुमसे उन सब बातों की चर्चा कर रहा था, जो एक प्रकार से गोपनीय थीं, तो मेरा अपना ही मन मुझसे प्रश्न कर रहा था कि मैंने तुममें ऎसा क्या पाया है कि मैं तुम पर इतना विश्वास कर रहा हूं कि तुम्हें अपनी वे योजनाएं बता रहा हूं, जो खुल जाएं तो मेरी हानि अवश्यंभावी थी।..." "हां!

यह बात तो मेरे भी मन में आई थी महाराज! कि किस कारण से आप मुझ पर इतना विश्वास कर रहे हैं।" युधिष्ठिर ने धीरे से कहा। विराट हंस पड़े, "पहली बात तो यह थी कि किसी पर तो मुझे भरोसा करना ही था। इसीलिए मैंने आरंभ में ही कहा था कि मैं एक जूआ खेल रहा हूं।

यदि मेरी कही हुई बातें तुम तक ही सीमित रहतीं, तो मैं मान लेता कि तुम एक विश्वसनीय व्यक्ति हो; और यदि वे बातें कहीं कीचक तक जा पहुंचतीं, तो भी मुझे तुम्हारी प्रकृति का ज्ञान हो जाता।... किंतु अब मुझे यह नहीं लग रहा कि मैं द्यूत खेल रहा हूं, मुझे लग रहा है कि मैंने अपनी विजयक्रीड़ा आरंभ कर दी है।" विराट सचमुच बहुत प्रसन्न दिखाई पड़ रहे थे।

***
पिछले कुछ दिनों से अपनी पाकशाला को लेकर विराट की चिंता बढ़ती जा रही थी। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि जब राज-परिवार के सदस्यों की संख्या में कोई वृद्धि नहीं हो रही थी; जब उनके सेवकों और कर्मचारियों की संख्या भी स्थिर है, तो भोजन सामग्री का व्यय क्यों बढ़ता जा रहा है।...