
आज उसे ब्याज सहित चुका दूंगा। उसे ग्रहण कर। दु:शासन की दृष्टि भीम पर पड़ते ही उसके मन में भी बहुत कुछ साकार हो उठा था। उसे भीम की प्रतिज्ञा का स्मरण हो आया था। भीम ने उसके वक्ष का रक्त पीने की प्रतिज्ञा की थी।... उसका मन सिहर उठा था।
भीम को अपनी प्रतिज्ञा स्मरण होगी। वह उससे पीछे नहीं हटेगा।... भीम ने प्रतिज्ञा की है तो क्या हुआ। दु:शासन भी कोई असमर्थ नहीं है; और इस समय तो कर्ण, दुर्योधन, कृतवर्मा, अश्वत्थामा तथा कृपाचार्य भी निकट ही थे।
उसके अपने दसियों भाई उसकी अपनी दृष्टिसीमा में थे। ऐसे में भीम से भयभीत होने का कोई कारण नहीं था। किंतु दु:शासन का एक मन था जो अब भी कांपता ही जा रहा था। उसकी बुद्धि उस कांपते मन को थामने व भय से उबारने का प्रयत्न कर रही थी।
सहसा दु:शासन का मन भय से बचने के लिए क्रूरता का कवच ओढऩे लगा। उसका भय जैसे ठिठक गया और उसे एक हिंस्र सुख का अनुभव होने लगा। उसका मन भीतर ही भीतर क्रूर से क्रूरतर होता जा रहा था।... इस समय यदि वह पहले आक्रमण कर देता है, और अपने साथियों की सहायता से इस मोटे को यहां घेर कर मार गिराता है, तो उसके प्राणों से एक भयंकर संकट टल जाएगा।
भीम के पश्चात् अकेला अर्जुन भी कितने दिन चलेगा। पांडवों के मारे जाने पर वह उनके अंत:पुर से द्रौपदी को उसी प्रकार घसीटकर लाएगा, जैसे द्यूत सभा में लाया था।... और इस बार उसे सभा में नहीं लाएगा, अपने अंत:पुर में ले जाएगा... द्रौपदी की स्मृति की सुगंध ही उसके मन और प्राणों को उन्मत्त कर देती है। उसका मन एक मधुर स्वप्न देखने लगा था... वह द्रौपदी के शरीर के साथ पहले से भी क्रूर खिलवाड़ कर सकेगा।
उसका मन क्रूर तो हुआ ही कुछ अश्लील भी हो उठा। चिल्लाकर बोला, मैं अपना किया भूलता नहीं। तुम्हें प्रमाणकोटि में विष दिया था और नागों द्वारा डसे जाने के लिए गंगा में बहा दिया था।
नरेंद्र कोहली के प्रसिद्ध उपन्यास से
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