
मजबूरी में मजदूरी के लिए प्रवास
नरपत दान बारहठ, टिप्पणीकार, समसामयिक विषयों पर लेखन
लॉकडाउन के कारण दूसरे राज्यों और शहरों में फंसे मजदूरों की समस्या को देखते हुए उनके घर वापसी को लेकर कवायद चल रही है। लेकिन यह समस्या तात्कालिक है, मूल समस्या यह नहीं है। मूल समस्या तो बेरोजगारी की मजबूरी में मजदूरी के लिए प्रवास करना ही है।कई राज्यों के हजारों युवा फैक्ट्रियों में लेबर, निर्माण कार्य, हाथठेला,फर्नीचर,रंगाई पुताई जैसे छोटे छोटे कामों के लिए सैकड़ों किमी दूर प्रवास करते है और लंबे समय बाद घर आ पाते है। ऐसे में मुख्य बात यह है कि अगर यह चिंता सालों पहले ही की जाती और समाधान ढूंढकर रास्ता निकाला जाता तो इन्हें अपने घर के नजदीक ही कामकाज मिल जाता। फिर इन्हें दूसरे राज्य या शहर के लिए माइग्रेट होने की नौबत ही नहीं आती,और ना इन्हें लॉक डाउन जैसी स्थिति में इतनी परेशानी उठानी पड़ती।
प्रश्न यह होना चाहिए कि इन कामगारों को अपने गृह राज्य और पैतृक गांव को छोड़कर दूसरे राज्य या शहर में जाना ही क्यों पड़ रहा है। क्यों न पहले से ही इनके लिए गृह नगर या गृह ग्राम में ही रोजगार की व्यवस्था हो। गौरतलब है कि कामगारों का गांवों से दूसरे शहरों और राज्यों की ओर पलायन का सिलसिला कोई नया मसला नहीं है।यह लंबे समय से जमी हुई समस्या है। मुंशी प्रेमचन्द ने 1936 में अपने प्रसिद्ध उपन्यास “गोदान” में “गांव छोड़कर शहर जाने की समस्या” को उठाया था। वही स्थिति आजादी के दशकों बाद आज भी कायम है। देश में पलायन की स्थिति कई राज्यों में है, जिनमें राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, प. बंगाल जैसे राज्य शामिल है, लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार में पलायन प्रवृति सबसे अधिक है। यहां के युवा रोजगार के लिए ज्यादातर गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब और कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना,हरियाणा आदि राज्यों में जाते हैं। वहीं पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र,केरल से पलायन नाम मात्र का होता है। इस रोजगार प्रवास के कई कारण उत्तरदायी है।
पहला तो, गाँव में बड़ी संख्या में युवा वर्ग खेती से दूर भाग रहा। उसका दूर भागना भी लाजिमी है, क्योंकि आज खेती में लागत ज्यादा और मुनाफा कम है और गावों में कृषि भूमि के लगातार कम होते जाने,अनुपयोगी होती भूमि, वर्षा का अभाव, आबादी बढ़ने और प्राकृतिक आपदाओं के चलते शहरों-कस्बों की ओर मुंह करना पड़ा। दूसरा, गांवों में इंडस्ट्रीज का ना होना।अक्सर देखने में आता है इंड्रस्टी वहीं लगाई जाती है,जहां पहले से बहुत कल कारखाने लगे हुए हैं। साथ ही कई शहरों और कस्बों की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां पर कोई कल कारखाना लगाना नहीं चाहता है, ऐसे में लोगों को पलायन कर श्रम को तलाश में आना पड़ता है। लेकिन गांवों में इंडस्ट्रीज तभी लगेगी जब वहां बिजली ,पानी,जमीन आदिकी व्यवस्था हो। गांवों में बिजली, आवास, सड़क, संचार, स्वच्छता, स्वास्थ्य,शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं शहरों की तुलना में बेहद कम है। इसलिए गावों में आधारभूत ढांचे की कमी भी पलायन की एक बड़ी वजह है। इसे सुधारने की जरूरत है। वहीं शहरी इलाकों में उद्योगों, कार्यालयों तथा विभिन्न प्रतिष्ठानों में रोजगार के अवसर दिखाई देते हैं। साथ ही शहरों में अच्छे परिवहन के साधन, शिक्षा केन्द्र, स्वास्थ्य सुविधाओं तथा अन्य सेवाओं ने भी गांव के युवकों, महिलाओं को आकर्षित किया है।
हालांकि आजादी के बाद भारत ने देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के इरादे से छोटे-बड़े उद्योगों की स्थापना का अभियान चलाया। लेकिन ये सभी उद्योग शहरों में लगाए गए या फिर एक जगह उद्योग लगाकर उद्योग नगर स्थापित कर दिए गए। नोएडा,गुरुग्राम,नीमराना आदि इसके उदाहरण है। जिसके कारण ग्रामीण लोगों का रोजगार की तलाश एवं आजीविका के लिए दूर पलायन करना आवश्यक हो गया। ग्रामीण युवाओं के पलायन को रोकने के लिए सर्वप्रथम तो उन्हें कृषि से संबंधित रोजगार, व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देना होगा। जिससे उन्हें उन्हीं के गाँव में रोजगार मिल सकेगा।
परम्परागत कृषि के स्थान पर पूंजी आधारित व अधिक आय प्रदान करने वाली खेती को प्रोत्साहन दिया जाए जिससे किसानों के साथ-साथ सीमांत किसानों और मजदूरों को भी ज्यादा से ज्यादा लाभ हो सके। सिंचाई सुविधा, जल प्रबन्ध इत्यादि के माध्यम से कृषि भूमि क्षेत्र का विस्तार किया जाना चाहिए, जिससे न केवल उत्पादन में वृद्धि होगी, साथ ही आय में भी वृद्धि होगी और आत्मविश्वास व स्वाभिमान जागृत होगा जिससे ग्रामीण पलायन रुकेगा।आने वाले समय में जहां हर ओर रोजगार घट रहे हैं ऐसे में कृषि क्षेत्र ही ऐसा क्षेत्र बचेगा जहां रोजगार होते रहेंगे, ऐसे में शून्य लागत प्राकृतिक खेती से देश की ग्राम रोजगार की समस्या हल की जा सकती है।
देखने में आ रहा है कि शून्य लागत खेती की ओर लोग लाखों रुपए की नौकरी छोड़कर आ रहे हैं। इसके अलावा सामाजिक समानता एवं न्याय पर आधारित समाज की स्थापना करना अति आवश्यक है। इसलिए सभी विकास योजनाओं में उपेक्षित वर्गों को विशेष रियायत दी जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाए जिसमें, परिवहन सुविधा, सड़क, चिकित्सालय, शिक्षण संस्थाएं, विद्युत आपूर्ति, पेयजल सुविधा तथा उचित न्याय व्यवस्था आदि शामिल हैं।
स्वरोजगार हेतु वित्तीय सहायता एवं प्रशिक्षण की सुविधा तथा प्रशिक्षण केन्द्र गांवों में खोले जाएं। रोजगार के वैकल्पिक साधन यथा बुनाई, हथकरघा, कुटीर और लघु उद्योग, साथ ही खाद्य प्रसंस्करण केन्द्र की स्थापना की जानी चाहिए। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुसंगठित एवं पारदर्शी बनाया जाए जिससे लोगों को उचित दामों से खाद्य सुरक्षा व अनाज उपलब्ध हो सके और ग्रामीण पलायन रोका जा सके। हालांकि लोक कल्याण करने एवं ग्रामीण पलायन रोकने के लिए सरकार द्वारा योजना तो लागू की जाती है लेकिन इससे पलायन पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका है। जैसे महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से रोजगार तो बढ़ा लेकिन इससे पलायन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।। योजनाएं बेरोजगारों की तादाद के हिसाब से व्यापक स्तर पर शुरू की जानी चाहिए। इस तरह की योजनाएं ग्रामीण महिलाओं के लिए भी लागू की जानी चाहिए।नहीं तो बढ़ती आबादी के साथ बेरोजगारी और गांवों से पलायन विकराल समस्या बन सामने आएगी।
Published on:
07 May 2020 01:21 pm
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