
माजुली है 'संस्कृति द्वीप', मुखौटों से बनी अलग पहचान
माजुली है 'संस्कृति द्वीप', मुखौटों से बनी अलग पहचान
शिवा यादव
अनसुनी कहानियां चुनता
और बुनता स्टोरीटेलर
असम को आश्चर्यजनक परिदृश्य और हरी-भरी प्रकृति का आशीर्वाद प्राप्त है। इसका प्रमुख कारण यह है कि यह ब्रह्मपुत्र नदी द्वारा धन्य है। ब्रह्मपुत्र दुनिया के सबसे बड़े नदी द्वीपों में से एक को अपने दिल में समेटे हुए है, वह है माजुली। इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। 300 वर्ग किलोमीटर में फैला यह द्वीप अपने पारंपरिक घरों और खूबसूरत नदी तटों के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन मुझे यह लगा कि किसी और चीज से ज्यादा यह एक 'संस्कृति द्वीप' है।
माजुली में 50 से अधिक 'सत्र' स्थापित किए गए थे। 'सत्र' असमिया भाषा का शब्द है जो ऐसे संस्थागत केंद्रों के लिए इस्तेमाल होता है, जो धार्मिक केंद्र तो होते हैं, लेकिन वे कला से भी जुड़े होते हैं। आज केवल 22 'सत्र' ही बचे हैं, लेकिन उनमें से प्रत्येक एक विशेष कला जैसे नृत्य, संगीत, हस्तशिल्प आदि को संरक्षित करने के लिए समर्पित है। मेरे पसंदीदा में से एक 'समागुरी सत्र' है, जो पारंपरिक मुखौटा बनाने के लिए समर्पित है, जिसका उपयोग 'भावना' में किया जाता है, यह एक पारंपरिक अभिव्यंजक नृत्य रूप है। हर खूबसूरत हाथ या आंख का इशारा कुछ न कुछ दर्शाता है। जैसे जब आप अपनी हथेली को मोड़ते हैं और अपनी उंगली उसके नीचे रखते हैं, तो यह कृष्ण द्वारा पर्वत को उठाने का प्रतिनिधित्व करता है। ये रंगीन मुखौटे इन शानदार प्रदर्शनों की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। यहां बनाए गए मुखौटे पूरी तरह से जैविक हैं। निर्माण में बांस, गाय के गोबर, मिट्टी और प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हैं। येे मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं। एक सिर्फ एक फेस मास्क है, जबकि दूसरा पूरे शरीर को कवर करता है, जो कई अन्य चीजों के अलावा, नरसिंह अवतार का प्रतिनिधित्व करने के लिए उपयोग किया जाता है। एक मास्टर मास्क निर्माता डॉ. हेम चंद्र गोस्वामी की विशेषज्ञता के कारण मास्क गति करने योग्य हो गए हैं। ये चलती आंखों, जबड़े, नाक आदि के साथ और अधिक जीवंत हो जाते हैं। मुखौटा बनाने की परंपरा को देखकर बेहद खुशी हुई। मेरा एक और पसंदीदा सत्र 'औनियाती सत्र' है, जो बेंत की चटाई बनाने के लिए समर्पित है। यहां हाथी दांत से बने आश्चर्यजनक गहने और आभूषण भी हैं, जो अब एक संग्रहालय में रखे गए हैं। वे हाथी दांत से लचीली चटाई भी बनाते थे। मैं उनके काम को देखकर देखकर दंग रह गया।
यहां सब कुछ ठीक नहीं है। द्वीप नदी के कटाव के दुष्प्रभाव झेल रहा है और हर साल सिकुड़ रहा है। करीब100 साल पहले जो 1200 वर्ग किलोमीटर से अधिक द्वीप हुआ करता था, वह अब उसके 30त्न से भी कम है। आशा है कि हम मनुष्य अपने पर्यावरण और पेड़ों की रक्षा करना सीखेंगे और ब्रह्मपुत्र इस द्वीप पर दया करेगी। अगली कहानी तक.. खुशियां ऑलवेज !!
Published on:
04 Oct 2022 08:19 pm
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