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देवताओं की प्रभात बेला मकर संक्रांति

छान्दोग्यपनिषद में वर्णित मधु विधा के प्रवर्तक महर्षि प्रवाहण हैं। मकर संक्रांति की खोज उन्होंने ही की। अपनी साधना के अनन्तर उन्होंने इसी दिन पंचम अमृत 'मधु' प्राप्त किया। मकर संक्रांति इसलिए सूर्य का अमृत तत्व की ओर अवगाहन है।

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Patrika Desk

Jan 15, 2023

देवताओं की प्रभात बेला मकर संक्रांति

देवताओं की प्रभात बेला मकर संक्रांति

राजेश
कुमार व्यास
कला समीक्षक
संक्रांति माने संगमन। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना। सूर्य जब एक राशि को छोड कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो संक्रांति होती है। बारह राशियां की बारह ही संक्रांतियां होती हंै। यों सब की सब पवित्र हैं, पर मकर संक्रांति विशिष्ट है। पुराण कहते हैं, सात घोड़ों द्वारा खींचे जाते, एक चक्रीय रथ पर सवार सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश कर उत्तर दिशा की ओर प्रयाण करते हैं, तो देव जागते हैं। यह महानिशा से जाग की घड़ी है। यानी देवताओं की प्रभात बेला। इसीलिए यह मंगलमय है। यही वह समय होता है जब दिवस माने उज्ज्वलता बढऩे लगती है और कालिमा से जुड़ी रात्रि छोटी होने लगती है।
छान्दोग्यपनिषद में वर्णित मधु विधा के प्रवर्तक महर्षि प्रवाहण हैं। मकर संक्रांति की खोज उन्होंने ही की। अपनी साधना के अनन्तर उन्होंने इसी दिन पंचम अमृत 'मधु' प्राप्त किया। मकर संक्रांति इसलिए सूर्य का अमृत तत्व की ओर अवगाहन है। यह निर्गुण शिव से साक्षात् की घड़ी है। शिव वह, जो सकल जगत के सृष्टिकर्ता हैं। परम मंगलमय उन परमेश्वर का नाम ही सविता है। सविता, आदित्य और सूर्य सब एक ही है-सृष्टि पालक शिव के रूप।
मकर संक्रांति से सूर्य अपने अनूठी आभा में गगन मंडल में विराजने लगते हैं। यहीं से कर्म की शुभ वेला प्रारम्भ होती है। पूरा माघ माह ही पवित्र, उत्सवधर्मी है। दान-पुण्य से जुड़ा माह। मघ संस्कृत शब्द है। अर्थ होता है-धन, स्वर्ण, वस्त्राभूषण, अन्न इत्यादि। इन पदार्थों के दान-पुण्य से जुड़े होने के कारण मकर संक्रांति का एक नाम माघी संक्रांंति भी है। माघ मास प्रकृति से जुड़ा प्रार्थना पर्व है। आइए, सप्तरंगी सूर्य से, शिव से हम इस पर्व पर अर्चा करें, 'हमें अंधकार रूपी अंधकार से ज्ञान का प्रकाश मिले।'
कहते हैं, वह मकर संक्रांति ही थी जब गंगा स्वर्ग से उतरकर धरती पर भगीरथ के पीछे-पीछे चली आई और राजा सगर के शापित साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया। देवताओं की प्रभात बेला पर शरीर त्यागने के लिए शांतनु पुत्र भीष्म शरशय्या पर लेटे रहे। उन्हें पिता से इच्छा मृत्यु का वर प्राप्त था, सो उन्होंने प्रतीक्षा की- सूर्य उत्तरायण में प्रविष्ट हो तो प्राण तजूं। यही हुआ भी।
गुजरात और महाराष्ट्र में लोग इस दिन घरों के बाहर रंगोली सजाते हैं। एक-दूसरे से हिल-मिल तिल-गुड़ खिलाते हैं और कहते हैं, 'तिल गुड़घ्या आपि गरुड़ गरुड़ बोला'। मतलब तिल गुड़ लो और मीठे बोल बोलो। यही वह समय भी होता है, जब हर ओर, हर छोर आकाश पतंगों से भर जाता है। मुझे लगता है, मकर संक्रांति का पतंगों से नाता भी प्रभु से की जाने वाली प्रार्थनाओं से ही जुड़ा है। बचपन से एक भजन सुनता आया हूं, 'साईं मैं तेरी पतंग।...थामे रहना जीवन की डोर।' पूरे भजन का अर्थ है-हे ईश्वर! मैं तेरी पतंग हूं। हवा में उड़ती जाऊंगी, डोर मत छोडऩा। सांसारिक आकाश में कितने जंजाळ हैं, उलझने मत देना। पेच लड़ गया तो कट जाऊंगी। बचाकर रखना।
रामकृष्ण परमहंस ने भी कहा, 'मां ने आत्मा की पतंग को ऊपर उड़ा रखा है, पर माया की डोर से बांधे हुए है अपने साथ। मां की कृपा होगी वही मुक्त होगा।' सोचता हूं, प्रार्थना के ऐसे स्वर ही मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने के हेतु बने होंगे। तमसो मा ज्योतिर्गमय!