
Patrika Opinion: शांति की राह बना सकता है मणिपुर समझौता
मणिपुर के सबसे पुराने उग्रवादी संगठन यूनाइटेड नेशनल लिबरेटेड फ्रंट (यूएनएलएफ) के साथ केंद्र और राज्य सरकार के बीच हुए समझौते से इस क्षेत्र में शांति के नए द्वार खुलने की उम्मीद की जा सकती है। जटिल सामाजिक संरचना वाले पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाववादी चरमपंथियों को वार्ता की मेज तक लाना किसी भी सरकार के लिए कठिन चुनौती रही है। जब भी ऐसी कोशिश होती है, कोई नया विद्रोही संगठन उसके खिलाफ खड़ा हो जाता है। पिछले कुछ माह में राज्य के बहुसंख्यक मैतेई व अल्पसंख्यक कुकी समुदायों के बीच हिंसा ने देश का ध्यान खींचा है। मैतेई व कुकी के बीच जातीय तनाव ने लगातार शिथिल पड़ते उग्रवादी गुटों को फिर से हरकत में ला दिया। केंद्र व राज्य सरकारें लगातार शांति बहाली के प्रयास करती रहीं और आखिरकार चरमपंथी गुट यूएनएलएफ को शांति के पथ पर लाने में सफलता मिल ही गई।
यह कहना जल्दबाजी होगी कि अब मणिपुर में सब कुछ सामान्य हो जाएगा। यूएनएलएफ राज्य का सबसे पुराना उग्रवादी संगठन जरूर है पर यही एकमात्र ऐसा संगठन नहीं है। मणिपुर में ऐसे करीब सात चरमपंथी संगठन सक्रिय हैं। भारत से अलग एक सम्प्रभु समाजवादी मणिपुर बनाने के उद्देश्य से अरेंबम समरेंद्र सिंह ने 24 नवंबर 1964 को यूएनएलएफ का गठन किया था। वर्ष 2000 में समरेंद्र की हत्या के बाद आर.के. मेघन ने इस संगठन की कमान अपने हाथ में ले ली थी। 2010 में मेघन की गिरफ्तारी के बाद खुंडोंगबाम पाम्बेई इसका अध्यक्ष बन गया था। 2021 में पाम्बेई गुट के यूएनएलएफ से अलग होकर एन.सी. कोइंरेंग के नेतृत्व में संगठन का एक नया गुट सामने आया।
पाम्बेई गुट से वार्ता की पहल लंबे समय से चल रही थी। ताजा शांतिवार्ता इसी गुट के साथ हुई है। इसमें कोई शक नहीं कि पिछले कुछ सालों में पूर्वोत्तर राज्यों के उग्रवादी संगठनों पर नकेल कसने में सुरक्षा बलों को काफी हद तक सफलता मिली है। मणिपुर में ज्यादातर चरमपंथी या तो कमजोर हो गए हैं या शांत हैं या म्यांमार में जा छिपे हैं। वहां उन्हें स्थानीय जनता और सेना से हर तरह की मदद मिलती रही है। लेकिन पिछले कुछ समय से म्यांमार सेना और स्थानीय लोगों के बीच तनाव बढ़ा है। ऐसी खबरें हैं कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के इनपुट के आधार पर म्यांमार सेना (जुंटा) ने अपनी जमीन पर मौजूद पूर्वोत्तर के उग्रवादी शिविर ध्वस्त कर दिए हैं। हो सकता है इसी कारण यूएनएलएफ ने शांति समझौता करना श्रेयस्कर समझा हो। इतिहास गवाह है कि ऐसे शांति समझौतों का इस्तेमाल उग्रवादी संगठन ताकत बढ़ाने के लिए करते रहे हैं। वैसे भी स्थायी शांति तभी संभव है जब सभी उग्रवादी समर्पण के लिए तैयार हो जाएं। यूएनएलएफ के साथ समझौता अन्य उग्रवादियों को रास्ता दिखा सकता है।
Published on:
30 Nov 2023 10:39 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
