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कृष्णा ढाबे पर हमले के मायने पांच: अल्पसंख्यक,व्यापारी और निवेशकों को धमकी, संसद से लेकर यूरोपियन यूनियन को ताकत का प्रदर्शन

—ढाबे मालिक के बेटे आकाश को लगी तीन गोली,पहली बार हड़ताल में खुला था यह ढाबा

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Sunil Sharma

Feb 18, 2021

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- आनंद मणि त्रिपाठी, जयपुर

श्रीनगर के सोनवार इलाके में स्थित कृष्णा ढाबे के मालिक पर हुआ आतंकी हमला कोई आम हमला नहीं है। यह संकेत है अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का। यह धमकी है व्यापारी और निवेशक वर्ग को। ताकत का प्रदर्शन है यूरोपी यूनियन के लिए। सबसे प्रमुख बात है आतंकियों का संदेश है गृहमंत्री की संसद में रखी गई बात से स्थिति को उलट दिखाने की। इन मुख्य बातों से आप इनके मायने बहुत आसानी से निकाल सकते हैं।

आतंकियों ने इन सभी बातों को ध्यान में रखकर ही गुपकार, डल और जम्मू रोड के संगम पर स्थित इस ढाबे पर हमला किया है। यह श्रीनगर का ही नहीं बल्कि पूरे जम्मू—कश्मीर का सबसे प्रसिद्ध ढाबा है। कोई पर्यटक कश्मीर आए और कृष्णा ढाबा पर खाना न खाए। ये बहुत कम है। फिर चाहे वह मांसाहारी हो या शाकाहारी।

मुख्य न्यायाधीश के बंगले से 200 मीटर दूर और यूएन मिलिट्री आब्जर्बर कार्यालय के करीब इस ढाबे पर हमला करके यह जताने की कोशिश की है कि कोई भी उनकी पहुंच से दूर नहीं है। इन सब बातों के बीच एक बात बहुत गौर करने वाली है कि यह वह ढाबा है जो श्रीनगर के अच्छे से अच्छे होटलों को भी कमाई के मामले में मात देता है। ऐसे में नए आतंकी संगठन के नाम पर व्यापारिक दुश्मनी के एंगल पर भी गौर कर रही है।

कृष्णा ढाबा पर ही हमला क्यों?
जम्मू—कश्मीर में बात भले ही भाईचारे की की जाए लेेकिन आतंकियों का संदेश साफ है कि घाटी में अल्पसंख्यक बर्दाश्त नहीं। दूसरी बात आतंकियों के पास पैसे की कमी आई है तो व्यापारी वर्ग को वसूली का सीधा संकेत है। तीसरी बात जम्मू—कश्मीर का सबसे प्रसिद्ध शाकाहारी ढाबा है तो आतंक का सदेंश प्रसारित करने में आसानी। चौथी बात यह है कि कोई भी उनकी पहुंच से बाहर नहीं।

आतंकियों के नए संगठन?
मुस्लिम जंगबाज फोर्स। लश्कर-ए-मुस्तफा और द रेजीसटेंस फोर्स। यह कश्मीर घाटी के नए आतंकी संगठनों का नाम है। यह संगठन लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन के इशारे पर चल रहे हैं। पाकिस्तान एफएटीएफ की ब्लैक लिस्टिंग से बचना चाहता है इसलिए आईएसआई के इशारे पर कश्मीर में दर्जन भर से अधिक छोटे आतंकी संगठन बनाए गए हैं।

दौरे के दिन ही क्यों?
विशुद्ध रूप से इसे ताकत का प्रदर्शन है। आतंकियों ने ऐसा इसलिए किया जिससे वह यह बता सकें कि अभी भी कश्मीर में उनकी ही हुकूमत चलती है। भारतीय सुरक्षाबलों ने 2019 में 152 आतंकियों को मारा और 2020 में 203 आतंकियों को मारा है। फंड की कमी आई तो दुकानदारों को धमकाकर उगाही बढ़ाने पर भी जोर है। यही वजह है कि आंतकियों ने सबसे सुरक्षित इलाके में हमले का टारगेट चुना।

पहली बार हड़ताल में खुला था ढाबा
श्रीनगर में अलगाववादी हड़ताल बुलाएं या फिर राजनीतिक संगठन। आतंकी बंद का एलान करें या फिर गिलानी। कृष्णा ढाबा हड़ताल में कभी भी नहीं खुलता था लेकिन बुधवार को यह ढाबा हड़ताल की कॉल के बावजूद पहली बार खुला हुआ था। संदीप मावा बताते हैं कि ऐसा कभी भी नहीं हुआ कि हड़ताल में ढाबा खुल जाए चाहे वह कोई भी बुलाए।

ये तो नहीं है सूफियाना कश्मीर...
मित्रों के साथ खाना खाकर करीब तीन मिनट पहले ही इस ढाबे से निकला था। पहली ढाबे पर बैठे आकाश से बात है। रमेश की जगह उसे बैठा देख अच्छा लगा लेकिन जैसे ही आतंकी हमले की सूचना मिली दिल बैठ गया। 22 साल का बच्चा और गोली मार दी। यह अल्पसंख्यकों को डरा नहीं रहे तो क्या कर रहे हैं? यह नकाबिले बर्दाश्त है। कहेंगे हम सेकुलर हैं और फिर करेंगे यह। तीन बुलेट लगी हैं। ईश्वर से दुआ है कि किसी तरह बच जाए।
संदीप मावा, जम्मू—कश्मीर रिकांसिलेशन फ्रंट