16 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

अशोक की पत्नी से जुड़े चित्रों का अर्थ

यह लिख रहा हूं और अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के बहुतेरे चित्र जहन में कौंध रहे हैं। सम्राट अशोक की एक पत्नी 'तिष्यरक्षिता' के कथा-संदर्भों में कभी उन्होंने चित्रों की पूरी एक शृंखला रची थी। यह वह समय भी था जब सम्राट का बौद्ध धर्म से गहरा जुड़ाव हो गया था।

2 min read
Google source verification

image

Patrika Desk

Oct 23, 2022

अशोक की पत्नी से जुड़े चित्रों का अर्थ

अशोक की पत्नी से जुड़े चित्रों का अर्थ

राजेश कुमार व्यास
कला समीक्षक
कलाओं में कलाकार की सूक्ष्म दृष्टि उसके मानसिक रूपों की सृष्टि होती है। चित्रकला और मूर्तिकला की हमारी परम्परा में जाएंगे, तो पाएंगे वहां बाह्य जगत और उससे जुड़े संदर्भों, कथा-कहानियों से कलाकार ने सदा ही अपने अंतर को उद्घाटित किया है। कलाकृति में किसी कलाकार के लिए कथा-कहानियों का संदर्भ परिचय के लिए तो उपयोगी होता है, पर संवेदना की आंख में कला प्राय: इतिहास-संदर्भ मुक्त ही होती है। इतिहास असल में तथ्यों पर निर्भर भौतिकवादी विचार है, जबकि कलाएं अंतर्मन का विचार-उजास है।
यह लिख रहा हूं और अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के बहुतेरे चित्र जहन में कौंध रहे हैं। सम्राट अशोक की एक पत्नी 'तिष्यरक्षिता' के कथा-संदर्भों में कभी उन्होंने चित्रों की पूरी एक शृंखला रची थी। यह वह समय भी था जब सम्राट का बौद्ध धर्म से गहरा जुड़ाव हो गया था। तिष्यरक्षिता को इसीलिए अशोक के प्रिय उस बोधिवृक्ष से भी भयंकर ईष्र्या थी, जिसके कारण सम्राट बौद्ध साधुओं के चक्कर में उससे दूर रहने लगा था। एक कथा यह है कि अपनी काम-तृषा बुझाने के लिए उसने अपनी ही वय के अशोक के पुत्र कुणाल से प्रणय निवेदन किया। यह स्वाभाविक ही था कि कुणाल ने यह अस्वीकार कर दिया। कुणाल यानी जिसकी आंखें बहुत सुंदर हों। तिष्यरक्षिता ने राजमुद्रा का प्रयोग कर कुणाल की आंखें निकलवा ली थीं। अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने इस कथा-रूपक के संदर्भ में अंतर्मन का आलोक रचा है।
'अशोक की पत्नी' शृंखला के अवनीन्द्रनाथ के सिरजे एक चित्र में कुणाल की आंखें निकलवाने के बाद क्रुद्ध दृष्टि लिए तिष्यरक्षिता बोधिवृक्ष की छिन्न-भिन्न, उखाड़ी एक शाखा की ओर बड़ी उपेक्षा और अंहकार भाव से देख रही है। अवनीन्द्रनाथ ने इस कलाकृति में उसकी लचकदार कमर और उनके ऊपर विकसित, भारी उरोज उकेरे हैं। एक दृष्टि में कलाकृति तिष्यरक्षिता के कामुक चरित्र को दर्शाती है, पर चित्र का सच यही नहीं है। कुबेरनाथ राय ने अपने एक ललित निबंध में इस कलाकृति की विरल विवेचना की है, जिसका उल्लेख जरूरी है। वह लिखते हैं, ज्योतिष शास्त्र मानता है कि मनुष्य के जीवन पर तिष्य नक्षत्र का प्रभाव माता के प्रभाव की तरह पोषक और मंगलमय होता है। तिष्यरक्षिता का यह चित्र इस दृष्टि से काम-तृषा नहीं, मातृत्व-तृषा है। बोधिवृक्ष के प्रति भी तृष्यरक्षिता का क्रोध इसीलिए है कि वह मां बनने में बाधक है।
भारतीय चित्रकला और मूर्तिकला में पूर्ण विकसित बड़े उरोज प्राय: माता पार्वती और लक्ष्मी के मातुकाओं के रूप में ही हैं। अवनीन्द्रनाथ ठाकुर चूंकि भारतीय संस्कृति और अध्यात्म के इन गहरे सरोकारों से जुड़े थे। संभव है इसी आधार पर उन्होंने तिष्यरक्षिता के मातृ-तृषा पूर्ण नहीं होने की क्रुद्ध दृष्टि को अपनी कलाकृति में उकेरा है। 'अशोक की पत्नी' शृंखला की उनकी कलाकृतियां अभी भी इस दृष्टि से गंभीर गवेषणा की मांग करती हंै। कलाकृतियों को लेकर बनी-बनाई धारणाओं को उनसे जुड़े प्रचलित संदर्भों से मुक्त देखेंगे तो भारतीय कला का और भी बहुत कुछ महत्त्वपूर्ण हम पा सकेंगे। सवाल यह भी है कि भारतीय कलाकृतियों की आलोचना उनमें निहित विचार के आलोक में कितनी हुई है? कला-रूपों की हमारी समृद्ध परम्परा आज भी इस दृष्टि से गहन गवेषणा की मांग क्या नहीं करती?