
media censorship
- एच. के. दुआ
सरकार इस अध्यादेश को सदन में रखती तो इसे अदालत में चुनौती जरूर मिलती। वहां इसे रद्द कर दिया जाता। शायद सरकार को चेहरा छिपाने का बहाना चाहिए था इसीलिए उसने दंड विधियां (राजस्थान संशोधन) विधेयक, 2017 प्रवर समिति को सौंपा। अच्छा तो यह होता कि इस काले कानून को वापस ही ले लिया जाता।
वर्ष 1966 में पहले प्रेस आयोग की सिफारिश के आधार पर, समाचार पत्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ उनके स्तर को बनाए रखने और उसमें सुधार के लिए भारत में प्रेस काउंसिल बनाई गई। तब यह सोचा गया था कि उसे कानूनी शक्तियां देने की जरूरत नहीं है। अपेक्षा की गई थी कि प्रेस काउंसिल जिन बातों को समझेगी और हिदायतें देगी, उसे सही मानते हुए समाचार पत्र उसकी अनुपालना करेंगे।
इतने वर्षों का तजुर्बा है कि बहुत से अखबार वालों ने प्रेस काउंसिल की हिदायतों की अनुपालना नहीं की। कानूनी शक्तियां न होने के कारण प्रेस काउंसिल इसके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं कर सका। यह बात भी सही है कि यदि प्रेस काउंसिल की ओर से कोई कार्रवाई की जाती तो उसे न्यायालय में ही चुनौती दे दी जाती। मेरा मानना है कि प्रेस काउंसिल को संविधान में संशोधन करके कानूनी शक्तियां देनी चाहिए। यह संशोधन भी होना चाहिए कि यदि प्रेस काउंसिल के किसी फैसले से असहमति है तो इसकी अपील भी प्रेस काउंसिल में ही हो।
एक बात और है कि प्रेस काउंसिल के दायरे में केवल समाचार पत्र ही आते हैं जबकि आज के दौर में मीडिया का क्षेत्र व्यापक हो गया है। इंटरनेट और टेलीविजन भी समाचारों के बड़े स्रोत बन चुके हैं। टेलीविजन तो प्रेस काउंसिल को स्वीकार नहीं करता। टेलीविजन न्यूज चैनलों ने स्वैच्छिक नियंत्रण के लिहाज से अलग इकाई बना जरूर रखी है पर इसे कानूनी मान्यता नहीं है। इसके अलावा सभी चैनल इसके सदस्य भी नहीं है। किसी का कोई नियंत्रण ही नहीं है। वैसे भी स्वैच्छिक नियंत्रक संस्था की कोई कद्र नहीं होती। कुल मिलाकर समाचारपत्रों, टेलीविजन और इंटरनेट मीडिया के लिए नियामक काफी कमजोर स्थिति में है। ऐसे में व्यापक प्रभाव के लिए मीडिया काउंसिल बननी चाहिए। इसे पूरे कानूनी अधिकार मिलने चाहिए। मीडिया पर नियंत्रण मीडिया से संबंधित संस्था द्वारा ही किया जाना चाहिए।
एक बात यह भी देखने में आ रही है कि सरकार किसी भी दल की हो मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश करती है। एक बार बिहार में भी प्रेस विधेयक लाया गया था, जिसे वापस लेना पड़ा था और तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने इसे अपनी भूल माना था। इसी तरह एक बार केंद्र में जब राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार सत्ता में थी और लोकसभा में उनके पास 402 सांसदों का समर्थन भी था। वे सितंबर 1988 में प्रेस की आवाज दबाने वाला ‘अवमानना विधेयक’ लेकर आए। लोकसभा में इसे सरलता से पारित भी करा लिया गया लेकिन इसके विरोध में सभी समाचार पत्र, एडिटर्स गिल्ड आदि इकट्ठा हो गए और जबर्दस्त आंदोलन हुआ। आखिरकार, इस विधेयक को प्रचंड बहुमत वाली सरकार को वापस लेना पड़ा।
राजस्थान में भी प्रेस की अभिव्यक्ति के विरुद्ध इसी किस्म का काला कानून लाने की कोशिश हुई। यदि सरकार इस अध्यादेश को सदन में रखती तो इसे न्यायालय में चुनौती जरूर मिलती और वहां इसे रद्द कर दिया जाता। शायद सरकार को चेहरा छिपाने का बहाना चाहिए था और इसीलिए उसने दंड विधियां (राजस्थान संशोधन) विधेयक, 2017 को प्रवर समिति को सौंप दिया। अच्छा तो यह होता कि इस काले कानून को वापस ही ले लिया जाता। पत्रकार जगत इसे लेकर आंदोलित है और राजस्थान पत्रिका इस मामले में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यह काम भी वह तब कर पा रहा है, जबकि आम जनता उसका साथ दे रही है। यदि लोग साथ नहीं देते तो प्रेस की ताकत कमजोर पड़ जाती है।
आम जनता किसी भी समाचार पत्र या न्यूज चैनल का तभी साथ देती है जब उसकी विश्वसनीयता होती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि इस तरह की लड़ाई में विज्ञापन रोक कर मीडिया पर दबाव डाला जाता है लेकिन जब जनता साथ है तो डर काहे का। यह संघर्ष जारी रहना चाहिए। हां, इतना जरूर है कि जब इस तरह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला हो तो हमेशा जागृत रहना चाहिए। जब भी सरकार कोई ऐसा काम करे जो अभिव्यक्ति की आजादी के विरुद्ध हो तो जमकर आवाज उठानी ही चाहिए। आजादी का इस्तेमाल करना है तो हमेशा चौकस रहना ही होगा। हालांकि चुनौतियां फिर भी कम नहीं हैं। पिछले दिनों खोजपूर्ण पत्रकारिता करने वाली गौरी लंकेश की हत्या हुई। उन्होंने कभी कोई ऐसा काम नहीं किया जो देश के विरुद्ध हो, फिर भी उनकी आवाज को शांत किया गया।
नरेंद्र दाभोलकर, कलबुर्गी, शांतनु भौमिक कई नाम हैं, जिनकी अभिव्यक्ति की आजादी की लड़ाई लड़ते हुए हत्या हुई। यह लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है। लोकतंत्र में जरूरी नहीं कि बहुमत की बात ही सही हो। अल्पमत की राय भी सही हो सकती है और उसे आम लोगों तक पहुंचने का अधिकार है। लोकतंत्र और मतभेद साथ चलते हैं। मतभेद रखने का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए। एक अन्य बात यह भी है कि प्रेस पर कॉर्पोरेट जगत भी हावी हो रहा है और यदि सरकार और उनका मेल हो जाए तो यह प्रेस की स्वतंत्रता के लिए खतरा हो सकता है। एक दबाव भीड़ का भी होता है, ऐसे में जरूरी है कि भीड़ के दबाव में आए बिना एकला चलो रे की रणनीति के साथ आगे बढऩा चाहिए।

Published on:
18 Nov 2017 12:58 pm
