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माइक्रोप्लास्टिक से बढ़ रहा है मानव के स्वास्थ्य को खतरा

माइक्रोप्लास्टिक से पर्यावरण प्रदूषित होने के साथ ही कुछ प्रजातियों के नष्ट होने का भी बहुत बड़ा खतरा बना हुआ है। इसके साथ ही इस बात के प्रमाण भी मिले हैं कि प्लास्टिक के छोटे-छोटे कण या टुकड़े इंसान के स्वास्थ्य के लिए भी बहुत हानिकारक हो सकते हैं।

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Patrika Desk

Feb 09, 2023

माइक्रोप्लास्टिक से बढ़ रहा है मानव के स्वास्थ्य को खतरा

माइक्रोप्लास्टिक से बढ़ रहा है मानव के स्वास्थ्य को खतरा


ऋषभ मिश्रा
असिस्टेंट प्रोफेसर, कानपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी कानपुर

माइक्रोप्लास्टिक से पर्यावरण प्रदूषित होने के साथ ही कुछ प्रजातियों के नष्ट होने का भी बहुत बड़ा खतरा बना हुआ है। इसके साथ ही इस बात के प्रमाण भी मिले हैं कि प्लास्टिक के छोटे-छोटे कण या टुकड़े इंसान के स्वास्थ्य के लिए भी बहुत हानिकारक हो सकते हैं। दरअसल, समुद्र में जाने वाला प्लास्टिक विघटित होकर माइक्रोप्लास्टिक के रूप में भी सामने आता है। ये वे कण होते हैं, जिनका व्यास 5 मिलीमीटर से भी कम होता है। आइयूसीएन के अनुसार पिछले चार दशकों में समुद्र के सतही जल में इन कणों में काफी वृद्धि हुई है। हाल के कुछ अध्ययनों में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि प्लास्टिक के कण इंसान के खून और वायु मार्ग में अपना रास्ता खोज रहे हैं। हर साल लाखों टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है और वह छोटे-छोटे कणों में पर्यावरण में फैल जाता है। प्लास्टिक के छोटे कण इंसान की सेहत के लिए कितने खतरनाक साबित हो सकते हैं, इस पर फिलहाल कई अध्ययन चल रहे हैं। माना जाता है कि ये सूक्ष्म कण फेफड़ों में लंबे समय तक बने रह सकते हैं और इससे फेफड़ों में सूजन आ सकती है। सूजन के दौरान ये कण प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान तक पहुंचा सकते हैं। इसके साथ ही ये कैंसर जैसी बीमारियों को जन्म देने में भी सहायक हैं। ये सूक्ष्म प्लास्टिक के कण प्रजनन और विकास संबंधी समस्याओं के भी कारण हैं।
विशेषज्ञों ने एक अध्ययन में बताया है कि रोजाना इस्तेमाल होने वाली किन चीजों से खून और फेफड़ों में माइक्रोप्लास्टिक भर जाते हैं। शोधकर्ताओं ने 12 प्रकार के प्लास्टिक की पहचान की है, जिसमें पॉलीप्रोपाइलीन और पॉलिथीन के साथ ही टेरेफ्थेलेट और राल शामिल हैं। ये प्लास्टिक आमतौर पर पैकेजिंग, बोतल, कपड़े और रस्सी निर्माण में पाए जाते हैं। माइक्रोप्लास्टिक के सबसे खतरनाक स्रोतों में शहर की धूल, कपड़ा और टायर भी शामिल हैं। कई खाद्य और पेय पदार्थ भी शरीर में माइक्रोप्लास्टिक भर रहे हैं। इनमें बोतलबंद पानी, नमक, समुद्री भोजन, टीबैग, तैयार भोजन और डिब्बाबंद भोजन शामिल हैं। ऐसा माना जाता है कि प्लास्टिक के कण लंबे समय के लिए फेफड़ों के ऊतकों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे कैंसर, अस्थमा, हार्ट अटैक और अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं होती हैं।
नए अध्ययन ने मनुष्य के स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। 'प्लोस वन जर्नल ' के मुताबिक माइक्रोप्लास्टिक रक्त वाहिकाओं के माध्यम से संवहनी ऊतक तक जा सकते हैं। हालांकि वैज्ञानिक स्वास्थ्य प्रभाव की गंभीरता का निर्धारण नहीं कर पाए हैं। 'यूनिवर्सिटी ऑफ हल' और 'हल यार्क मेडिकल स्कूल टीम ' ने इस अध्ययन का विश्लेषण तब किया, जब दिल की बाईपास सर्जरी करा रहे एक मरीज की नस के ऊतक की जांच की गई। इस दौरान नसों के ऊतक में माइक्रोप्लास्टिक के कण और ऊतक में पांच अलग अलग प्रकार के बहुलक पाए गए। शोधकर्ताओं द्वारा जांच में पता चला कि ये सभी कण 'एल्केड राल' हैं जो कि सिंथेटिक पेंट में पाया जाने वाला पदार्थ है। साथ ही 'पॉलीविनाइस एसीटेट' (नायलोन में चिपकने वाला पदार्थ) और 'ईवीओएस' (पैकेजिंग सामग्री में इस्तेमाल किया जाने वाला पदार्थ) माइक्रोप्लास्टिक का स्तर फेफड़े के ऊतकों मेें अधिक था।
रक्त में माइक्रोप्लास्टिक की बात सामने आ चुकी है, लेकिन ये कण नसों में भी रिस सकते हैं, इसके बारे में अब पता चला है। पहले यह भी स्पष्ट नहीं था कि वे नसों के संवहनी ऊतक को पार कर सकते हैं। 'साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट' में प्रकाशित एक अध्ययन में फेफड़े के सभी हिस्सों में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक की खोज की गई। एक अध्ययन में कपड़ा श्रमिकों में पॉलिएस्टर और नायलॉन फाइबर से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक कणों की वजह से खांसी, सांस फूलना और फेफड़ों की क्षमता कम होना आदि समस्याएं देखी गई हैं। 'डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंटरनेशनल ' के 2019 में प्रकाशित एक शोध में बताया गया है कि वातावरण में प्लास्टिक का इतना प्रदूषण है कि इंसान सप्ताह में करीब ५ ग्राम प्लास्टिक अपने अंदर ले रहा है। इससे साफ जाहिर है कि प्लास्टिक से दूरी बनाने का समय आ गया है।