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देरी से, पर जरूरी कदम है सहकारिता मंत्रालय

सहकारिता मंत्रालय का गठन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते वह जल्द और प्रभावी तरीके से सक्रिय हो सके।

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देरी से, पर जरूरी कदम है सहकारिता मंत्रालय

देरी से, पर जरूरी कदम है सहकारिता मंत्रालय

नरेंद्र मोदी सरकार ने मंत्रिमंडल पुनर्गठन से ठीक पहले सहकारिता मंत्रालय का गठन कर 'सहकार से समृद्धि' के अपने नजरिये को जमीन पर उतारने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया जब देश में किसान आंदोलन की गूंज है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। पिछले दशकों में कृषि आय में लगातार कमी हुई है और बदहाल छोटे किसान कर्ज के दलदल से निकलने के लिए छटपटा रहे हैं। सहकारिता मंत्रालय का गठन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते वह जल्द और प्रभावी तरीके से सक्रिय हो सके। इस मंत्रालय का जिम्मा अपने सबसे दमदार केंद्रीय मंत्री अमित शाह को सौंपकर प्रधानमंत्री मोदी ने इतना संकेत तो दे ही दिया है कि वह देश में सहकारिता अभियान को नया जीवन देना चाहते हैं।

निर्मला सीतारमण ने इस साल अपने बजट भाषण के दौरान कहा था, 'सरकार बहुराज्यीय सहकारी विकास के प्रति वचनबद्ध है और इसे हर तरह का सहयोग प्रदान किया जाएगा। सहकारी संगठनों के कामकाज को सुचारू करने के लिए अलग से एक प्रशासनिक तंत्र स्थापित किया जाएगा।' अर्थव्यवस्था को सुधारने में सहकारिता अभियान की भूमिका जब सरकार भी समझ रही है तो यह कदम को उठाने में इतनी देरी क्यों हुई?

देश में सहकारिता आंदोलन नई बात नहीं है। गुजरात में जब छोटे किसान स्थानीय व्यापारियों व बिचौलियों की मनमानी से परेशान थे, तब सरदार वल्लभभाई पटेल ने सहकारिता की राह दिखाई थी। इससे न सिर्फ किसानों की आमदनी बढ़ी, बल्कि राज्य की जीडीपी के विकास में भी इसने अहम भूमिका निभाई। सहकारिता आंदोलन का उद्देश्य किसानों को फसल उगाने से लेकर प्रोसेसिंग व मार्केटिंग तक की जिम्मेदारी देना है। गुजरात मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड (जीसीएमएमएफ) इसकी सफलता का ही एक मॉडल है, जिसका उत्पाद 'अमूल' एक जाना-माना ब्रांड है।

पंजाब-हरियाणा और कई अन्य राज्यों के किसान इस बात के गवाह हैं कि कैसे बिचौलियों के कारण उनकी आमदनी में बट्टा लग रहा है। ये किसान इन दिनों सड़कों पर हैं क्योंकि केंद्र के नए कृषि कानूनों के चलते उन्हें बिचौलियों के चंगुल से निकल उद्योगपतियों के चंगुल में फंसने की आशंका है। ऐसे में सरकार को उन्हें यह भरोसा दिलाना होगा कि सहकारिता अभियान से जुड़कर वे अपना भाग्य खुद लिख सकते हैं। यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल, क्योंकि हितों का टकराव आड़े आएगा। क्या सरदार पटेल की तरह अमित शाह पर भी किसान भरोसा करेंगे? यह आने वाला समय और उनके काम का तरीका तय करेगा।