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लोकतंत्र और भ्रष्ट व सुप्त अफसरशाही के लिए आईना

'तेरा भी मेरा' पर प्रतिक्रियाएं  

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कोरोना के कारण निजी रिजॉर्ट बंद करने की मांग

कोरोना के कारण निजी रिजॉर्ट बंद करने की मांग

मनचाहे कानून -कायदे बनाकर आम लोगों से पैसे छीन लेने, लेकिन उनके हित व हक से बिलकुल भी सरोकार न दर्शाने की सरकारी प्रवृत्ति पर प्रहार करते पत्रिका के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी के अग्रलेख 'तेरा भी मेराÓ को प्रबुद्ध पाठकों नेे सराहा है। उन्होंने इसे नाम के रह गए लोकतंत्र और भ्रष्ट व सुप्त अफसरशाही के लिए आईना बताया है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से-

आमजन के साथ न्याय नहीं
आज आमजन के साथ न्याय नहीं हो रहा है। कानून और देश को अपने मुताबिक चलाने में माहिर हो चुके नेताओं के लिए रात 2 बजे अदालत खुलती है। राज्यपाल सुबह 4 बजे उठकर शपथ दिलवा सकते हैं। लेकिन जब यह बात जनता की हो तो अदालत की छुट्टी होती है और राज्यपाल को समय नहीं रहता।
-शांतिकुमार जैसानी, अधिवक्ता, हरदा

कानून की विसंगति है समस्या
कोठारी ने अफसरशाही के रवैये, सोच और कार्यशैली को लेकर आईना दिखाया है। कानून की विसंगति और आक्रामकता के कारण अमीर और गरीब के बीच दरार और गहरी होती जा रही है। सरकारी कानून अफसरों की अफसरशाही को बढ़ावा भी दे रहे हैं। सभी अपना हित साध रहे हैं। जनता के बारे में सोचने वाला कोई नहीं है।
-मालती श्रीवास्तव, लेखिका, छतरपुर

भ्रष्टाचार की जडें़ बहुत गहरी
यह बात सत्य है कि देश में रिश्वत और भ्रष्टाचार जड़ें इतनी गहरी जमा चुके हैं कि इस समस्या से उबर पाना आसान नहीं रह गया है। विडंबना यह है कि देश की सरकार भी इस समस्या के समाधान में कोई रुचि नहीं ले रही। अंतत: जनता को ही पिसना पड़ रहा है।
डॉ. आरके चौरसिया, व्याख्याता, शासकीय महाविद्यालय, मंडला

सोनचिरैया सा हो गया है लोकतंत्र
लोकतंत्र तो मानो सोनचिरैया हो गया है। भारतवर्ष में कभी कभार ही इसके दर्शन होते हैं। आपदा को अवसर में (स्वयं के लिए) बदलने की जो कला सरकार (तीनों स्तम्भ) सीख गए हैं, उससे आम जनमानस का उद्धार तो कभी होना नहीं है। क्या दुर्भाग्य है कि दूध, सब्जी की दुकान खुले न खुले, पर शराब की दुकान खुलना आवश्यक है।
हिमांशु कुलश्रेष्ठ, सामाजिक कार्यकर्ता, ग्वालियर

असमानता को दूर करना होगा
जब तक देश का कानून सभी के लिए समान नहीं होगा और इसका पालन समान रूप से नहीं होगा, तब तक देश में जो असमानता आई है वह दूर नहीं होगी। कानून का पालन तो जैसे आम आदमी की जिम्मेदारी है। देश के राजनेता और बड़े लोगों ने कानून को मजाक बना लिया है।
रमेश सिकरवार, शिक्षक, ग्वालियर

सोच में बदलाव जरूरी
आज वाकई में अमीर-गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। काला धन तिजोरियों में बंद है। कानून का देशवासी की समझ से कोई लेना देना नहीं रह गया। देश को समृद्ध बनने और आज़ादी का अनुभव करने के लिए अभी बहुत बदलाव ज़रूरी हैं। और सबसे ज़रूरी है सोच में बदलाव। इस तरफ सोचना ज़रूरी है।
भूपेंद्र गुप्ता, प्रमुख, विचार विभाग, भोपाल


चिंतन व मनन का समय
लेख में सही मुद्दा उठाया गया है। देश और दुनिया का तंत्र ऐसा है कि अमीर की आवाज सुनी जाती है और गरीब की चीख को भी अनदेखा कर दिया जाता है। मौजूदा दौर हमें भयावह हालात की ओर ले जा रहा है। इसलिए यह सही समय है चिंतन और मनन का और इस खाई को पाटने के लिए सोच में बदलाव लाकर नए रास्ते खोजने का।
प्रो. अजय नारंग, समाजशास्त्री, भोपाल

दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ही इलाज
अग्रलेख पढ़ कर निश्चित रूप से आम जनता और सरकारी लोग हकीकत समझ पाएंगे। आज भ्रष्टाचार सरकार के हर अंग में रच बस गया है। इन अव्यवस्थाओं को दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही दूर किया जा सकता है।
राजेश चौरसिया, संरक्षक, मध्यप्रदेश इंजीनियरिंग स्ट्रक्चरल एसोसिएशन, भोपाल

सही मुद्दा
कोठारी नेे सही मुद्दा उठाया है। लॉकडाउन में सारे धंधे चौपट हो गए। भविष्य की चिंता सताने लगी। लेकिन उद्योगों को बिजली का उपयोग नहीं करने के बावजूद फिक्स चार्ज देना पड़ा। यह लूट नहीं तो क्या है। क्या सरकार जनता के लिए नहीं है।
महेंद्र पारीक, टेक्सटाइल व्यवसायी, बुरहानपुर

जनता को राहत देने का समय
सरकार रिफंड के मामलों की अनदेखी कर रही है। यह समय जनता और व्यापारियों को राहत देने का है। सरकार में बैठे हमारे प्रतिनिधियों को चाहिए कि वह जनता के हित की योजनाएं बनाएं ताकि बेरोजगारी कम हो और अपराधों पर लगाम लगे।
प्रदीप रायकवार, कर सलाहकार, दतिया

अब जिंदा नहीं है लोकतंत्र
लोकतंत्र नाम की चीज अब बची ही कहां है, जो नजर आए। लोकतंत्र के नाम पर मजाक चल रहा है। जिनके मन में जो आ रहा है, वह अपने हिसाब से कर रहा है। वर्तमान परिदृश्य में जनता का जीना मुहाल हो गया है। अब सिर्फ कुछ परिवर्तन ही अच्छा कर सकता है।
सुधा तोमर, समाजसेविका, श्योपुर

आमजन अब भी गुलाम
पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे। वर्तमान में अधिकारियों और नेताओं के, जिन्होंने जनता पर अंग्रेजों जैसा सलूक शुरू कर दिया है। जितने भी कानून हैं उनमे बस गरीब ही फंसकर मर जाता है। रसूखदार का कुछ नहीं बिगड़ता। आज कोरोना काल में भी भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ।
मदन बिहारी श्रीवास्तव, वरिष्ठ एडवोकेट, शिवपुरी

पारदर्शी कानून की जरूरत
निश्चित रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था के कर्णधारों को बिना कोई अतिरिक्त बोझ डाले पारदर्शी कानून की जरूरत है। तभी जनमानस में विश्वास जागृत होगा, तभी हम आत्मनिर्भर भारत की ओर सही दिशा में कदम बढ़ा पाएंगे।
पुष्पेन्द्र नैनधरा, साहित्यकार, सागर

वास्तविक धरातल बताने की कोशिश
कोठारी ने सरकार की नीतियों में होने वाली गड़बडिय़ों का जबरदस्त खुलासा और वास्तविक धरातल बताने की मजबूत कोशिश की है। सरकार के बजट में 90 प्रतिशत हिस्सा वेतन और पेंशन देने में ही खत्म हो जाता है, यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ।
तरुण व्यास, कार्यकारी सचिव, एआईएमपी, इंदौर

चिंताजनक विषय
कोठारी ने सरकारी खजाने से धन निकालने के भ्रष्टाचार के जिस नए ढर्रे का उल्लेख किया है, वह चिंताजनक है। इस पर सभी प्रदेश और केंद्र सरकार को गंभीरता से विचार कर व्यवस्थाएं ठीक करने का सार्थक प्रयास करना होगा।
सुनील गुप्ता, पूर्व सदस्य, राज्य अधिवक्ता परिषद, इंदौर
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