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एक साथ चुनाव: यह साजिश तो नहीं?

एक साथ चुनाव हों तो सारा ध्यान लोकसभा के चुनाव पर होगा। राज्यों के मुद्दे दब जाएंगे

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Sunil Sharma

Oct 23, 2017

yogendra yadav

yogendra yadav

- योगेन्द्र यादव, टिप्पणीकार

बहस में सबसे महत्वपूर्ण पहलू अछूता रह गया। शायद ही किसी ने यह याद दिलाया कि यह सवाल हमारे संविधान से भी जुड़ा है। संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाने का मतलब होगा देश के संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था को समाप्त कर राष्ट्रपति व्यवस्था को स्थापित करना। एक साथ चुनाव हों तो सारा ध्यान लोकसभा के चुनाव पर होगा। राज्यों के मुद्दे दब जाएंगे। राष्ट्रीय व्यक्तित्व, राष्ट्रव्यापी पार्टी और पूरे देश का एक मुद्दा उभर कर सामने आएगा।

कुछ साल पहले प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार प्राप्त अमत्र्य सेन ने हमें आर्गुमेंटेटिव इंडियन की उपाधि दी थी। मैं सोचता हूं कि ‘आर्गुमेंटेटिव इंडियन’ का अनुवाद क्या होगा? तर्कशील भारतीय? या फिर बहसबाज भारतीय? मुझे बहसबाज ज्यादा सही लगता है। क्योंकि हम हिंदुस्तानियों की प्रवृत्ति है कि जिन मुद्दों पर बहस होनी चाहिए उन पर तो करते नहीं, लेकिन जिन पर समय बर्बाद करने की कोई जरूरत नहीं है उन पर लम्बी बहसों में उलझे रहते हैं। इस फिजूल की बहसबाजी का नवीनतम नमूना है देश भर में एक साथ चुनाव को लेकर चल रही बहस। अब चुनाव आयोग भी इस बहस से जुड़ गया है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने न जाने किसके पूछने पर कह दिया कि चुनाव आयोग संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने को तैयार है। पता नहीं यह प्रस्ताव वे किस कानूनी मर्यादा के तहत दे रहे थे। लेकिन ऐसे सवाल हमारे देश में बड़े लोगों से नहीं पूछे जाते हैं। पहली नजर में यह प्रस्ताव जंचता भी है। बताया जा रहा है कि एक साथ चुनाव से पैसे की बचत होगी। हर साल-छह महीने में देश में कहीं न कहीं चुनाव और आचार संहिता लागू होने पर सरकार का सारा काम ठप हो जाता है। एक साथ चुनाव होंगे तो केंद्र सरकार किसी न किसी राज्य में चुनाव जीतने की चिंता से मुक्त रहेगी। इस बात में भी तुक नजर आती है। हालांकि मेरे मन में एक दुविधा भी है। राजनेता का चिंताग्रस्त रहना ज्यादा बुरा है, या चिंता से मुक्त हो जाना? इतिहास तो यही बताता है कि चुनाव जीतने की चिंता से ग्रस्त नेताओं ने उतने बुरे काम नहीं किए हैं जितने लोकप्रियता के दबाव से मुक्त नेताओं ने।

पक्ष-विपक्ष के तर्क जो भी हों, मुझे हैरानी इस बात से हुई कि इस बहस में सबसे महत्वपूर्ण पहलू अछूता रह गया। शायद ही किसी ने यह याद दिलाया है कि यह सवाल हमारे संविधान से भी जुड़ा है। संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाने का मतलब होगा देश के संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था को समाप्त कर राष्ट्रपति प्रणाली को स्थापित करना। हमारी संविधान सभा ने एकराय से यह फैसला किया था कि हमें अमरीका जैसी राष्ट्रपति व्यवस्था की जगह ब्रिटेन जैसी संसदीय प्रणाली अपनानी चाहिए। संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका के प्रमुख यानी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की यह अनिवार्यता है कि उसे सदन में विधायिका का बहुमत प्राप्त हो। जिस दिन प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री सदन में बहुमत खो देते हैं उसी दिन उनकी सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है। राष्ट्रपति प्रणाली में ऐसी अनिवार्यता नहीं होती।

अमरीकी राष्ट्रपति को वहां की संसद यानी ‘कांग्रेस’ में बहुमत मिले या न मिले, उसके कार्यकाल पर इसका असर नहीं पड़ता। संसदीय व्यवस्था में विधयिका और कार्यपालिका में टकराहट की गुंजाइश नहीं है। संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था को बिना संविधान संशोधन के बदला नही जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय के हिसाब से तो इस हिस्से को संशोधन से भी नही बदला जा सकता। आप सोच रहे होंगे कि चुनाव की तारीख का इस संवैधानिक व्यवस्था से क्या संबंध है? संबंध सीधा है, पर पता नहीं क्यों बहस में इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी गयी है।

मान लीजिए कि देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव वर्ष 2019 में हो जाएं। अगला चुनाव 5 साल बाद वर्ष 2024 में होगा। मान कि वर्ष 2020 में किसी राज्य की सरकार बहुमत खो बैठती है। ऐसे में क्या होगा? अगला चुनाव तो चार साल दूर है। या तो सरकार बनी रहेगी, लेकिन सरकार के पास बहुमत नहीं है तो वह न कानून पास करवा सकेगी, न ही बजट ही पास करवा सकेगी। इस संवैधानिक संकट का क्या समाधान है? एक साथ चुनाव के इस शोरगुल में इस संवैधानिक पक्ष की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? एक साथ चुनाव की वकालत करने वाले कहते हैं अगर सरकार बीच रास्ते में विश्वास खो बैठती है तो उसे भंग किया जाए और फिर से चुनाव करवाये जाएं, लेकिन सिर्फ बाकी बचे हुए साल के लिए।

इस हिसाब से अगर सरकार वर्ष 2020 में विश्वास खोती है तो नई विधानसभा चार साल के लिये चुनी जाएगी। यानी कभी 5 साल के लिए चुनाव होंगे, कभी 3 साल के लिए और कभी 2 साल के लिये। इस तरह हम छोटे सरदर्द से निपटने के लिए बड़ा सरदर्द मोल लेंगें। तो क्या इस बहस के पीछे सिर्फ नासमझी है? संविधान को न पढऩे की भूल है? केवल प्रशासनिक अति उत्साह है? इस बहस के पीछे एक गहरा राजनैतिक खेल भी हो सकता है।

अगर देश भर में एक साथ चुनाव होंगे तो सारा ध्यान लोकसभा के चुनाव पर होगा। एक साथ चुनाव होने से अलग-अलग राज्यों के मुद्दे दब जाएंगे। राष्ट्रीय व्यक्तित्व, राष्ट्रव्यापी पार्टी और पूरे देश का एक मुद्दा उभरकर सामने आएगा। अब जरा सोचिए, इससे किस पार्टी को फायदा होगा। कहीं यह सारी बहस पिछले दरवाजे से चुपचाप देश में राष्ट्रपति प्रणाली लादने की शरारत तो नहीं? कहीं यह प्रस्ताव क्षेत्रीय और स्थानीय स्वरूप को मिटाने के प्रयास तो नहीं? कहीं यह खेल एक लंबे समय तक एक ही पार्टी का वर्चस्व स्थापित करने का षड्यंत्र तो नही? इस सवाल का जवाब मैं क्यों दूं? हम हिंदुस्तानी हैं, आर्गुमेंटेटिव इंडियन हैं, बहसबाज हैं। अब आप बहस कीजिए और जवाब दीजिए।