
चंदन तिवारी
लेखिका लोकगायन के लिए संगीत नाटक अकादमी के युवा सम्मान से सम्मानित बिहार, पूर्वांचल की चर्चित गायिका हैं
........................................
वेब सीरीज मिर्जापुर का तीसरा पार्ट रिलीज हो चुका है। सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा है। पहले वाला बढिय़ा था या यह बेहतरीन है, इस पर बात चल रही है। संयोग से यह तीसरा पार्ट जब जारी हुआ है, तब सावन महीने का माहौल बन चुका है। सावन दस्तक दे रहा है। सावन को याद करते ही हिंदी इलाके के लोक गायन में कजरी की चर्चा आती है। कजरी गायन का माहौल बन जाता है। और जब कजरी की चर्चा चलती है तो मिर्जापुर का नाम आता है।
वजह, इसी मिर्जापुर को कजरी विधा की जननी माना जाता है। न सिर्फ जननी है, बल्कि गांव की गलियों में गाई जाने वाली विधा को यहां के लोगों, कलाकारों ने अपनी निष्ठा, समर्पण और मोहब्बत से इस कदर सींचा कि यह मिर्जापुर से निकल बनारस होते हुए लोक संगीत, सुगम संगीत, शास्त्रीय संगीत, बॉलीवुड संगीत सभी में समान रूप से स्थापित होती गई। कजरी का राग दुनिया के मंचों पर पहुंचकर रंग बिखेरने लगा।
जिस शहर मिर्जापुर का नाम लेकर वेब सीरीज बनाई गई है, वह शहर उत्तरप्रदेश के विंध्य इलाके में आता है। इसी विंध्य इलाके में मशहूर देवी मंदिर है, विंध्याचल धाम। मान्यता है कि मां विंध्यवासिनी का एक नाम कज्जला देवी भी है। इलाके के लोग कहते हैं कि कजरी नाम, इन्हीं कज्जला देवी के नाम से आया। कज्जला, कजली और कजरी, तीनों एक ही है। हालांकि कजरी के उद्भव की और भी कहानियां हैं। यहां हर साल विंध्यवासिनी जन्मोत्सव और कजली महोत्सव का चलन रहा है। कहते हैं कि एक समय ऐसा भी था, जब ढाई दिन के इस उत्सव की अवधि में मिर्जापुर की सारी दुकानें बंद रहती थीं। इस उत्सव में कजरी के नए शिष्य अपने गुरुओं से दीक्षा लेकर, विंध्याचल मंदिर में आकर, सुमिरनी भेंट करते थे - सुमिरनी यानी प्रार्थना। सुमिरनी कर ही कजरी के संगीत अखाड़े में पहली बार उतरते थे। संगीत के उस्तादों, खलीफाओं और गुरुओं का जुटान होता था। कजरी गायन से पहले खंजरी पूजन नए कलाकारों के लिए प्रथम गायन का अवसर होता था। जो कजरी लिखते थे, वे भी पहली बार का लिखा यहां चढ़ावे में चढ़ाते थे।
विंध्याचल धाम को कजरी ने साझी संस्कृति का केंद्र बनाया। कजरी लोकगायन के लिए हिंदू और मुसलमान दोनों समुदाय के लोग समान उत्साह और समान अधिकार से पहुंचते थे। इसी इलाके के बड़े कजरीबाज थे प्रेमधन। इनकी हवेली को कजरी की हवेली भी कहते थे। इस हवेली में आषाढ़ से लेकर भादो तक कजरी की महफिल जमती थी। खड़ी बोली हिंदी के प्रणेता भारतेंदु इस हवेली में आकर डेरा जमाते थे। यहां विशाल लाइब्रेरी भी थी कजरी की। इससे इतर मिर्जापुर के इलाके में कजरी के मेले लगते। एक गायन विधा को केंद्र में रखकर मेले का चलन न के बराबर दिखता है। इन बातों पर चर्चा का आशय यह कि मिर्जापुर की पहचान इस कदर जुड़ी हुई है कजरी से, लोक संस्कृति से।
पुरबिया लोकगायन में कजरी सबसे विस्तारित विधा है गायन की। खेती-किसानी से लेकर धार्मिक और सामयिक सवालों तक के स्वर इसमें जुड़ते हैं। कजरी गीतों में अपने समय का इतिहास, समय के सवाल भी निरूपित हैं। कजरी गाते भी हैं, मनाते भी हैं, खेलते भी हैं। यह किसानों के जीवन में उल्लास भरने व स्त्रियों को आजादी का राग देने वाली विधा है। खेती-किसानी से जुड़ी कामगार स्त्रियां कजरी के जरिए खेत मालिकों से बराबरी का संवाद करने का अधिकार लेती रही हैं, बिना किसी डर, भय और हिचक के।
इस पारंपरिक लोक विधा ने समय के अनुसार नवाचार किया, दूसरी विधाओं की तरह लकीर की फकीर नहीं रही। समय के साथ खत्म नहीं हुई बल्कि और बढ़ती गई, कभी पारंपरिक जड़ता का शिकार नहीं हुई। क्या कुछ नहीं है इस विधा में! सृष्टि का स्वर है, प्रकृति का रंग है, प्रेम का सौंदर्य है, विरह का राग है। कजरी गीतों में 1857 की क्रांति से पहले की कहानियां मिलती हैं तो जब गांधी अफ्रीका से लौटे मिर्जापुर के गंवई गायकों ने गांधी को कजरी का नायक बनाया।
मिर्जापुर, बनारस से सटा शहर है। बनारस के मूर्धन्य कलाकारों ने इसे देश भर में फैलाया, दुनिया के मंचों पर। उस्ताद बिस्मिल्ला खान से लेकर गिरिजा देवी जैसे वरिष्ठ कलाकारों तक ने इसे एक अलग पहचान दी। वर्तमान में शास्त्रीय गायक छन्नूलाल मिश्र जिस मंच पर जाते हैं, कजरी की फरमाइश होती है। इसी मिर्जापुर से पलायन को केंद्र में रखकर एक गीत निकला- ‘मिर्जापुर कइले गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कइले बलमू..।’ यह गीत आज कजरी के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में एक है, जिसे अनेक कलाकार स्वर दे चुके हैं। इसी तरह एक कजरी गीत का शीर्षक है- ‘नागर नइया जाला कालापनिया ए हरि...।’ इस गीत की कहानी पर हिंदी के मशहूर लेखक शिव प्रसाद मिश्र रूद्र ‘काशिकेय’ ने मशहूर कृति बहती गंगा में लिखा।
संभव है आने वाले दिनों में जब हम किसी सर्च इंजन के जरिए मिर्जापुर को सर्च करेंगे, तो अपराध-हिंसा के रंगों में सना हुआ मिर्जापुर ही दिखे गाली-गलौज की भाषा के साथ। जिन्होंने मिर्जापुर इलाके को कभी देखा-जाना नहीं है, वे इसे ही पूरा सच मान भी लेंगे। लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि कजरी संगीत पीढिय़ों से मिर्जापुर को गुलजार करता रहा है।
Published on:
15 Jul 2024 10:50 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
