
jammu kashmir
- डॉ. नूर अहमद बाबा
आंदोलनकारी या प्रदर्शनकारियों को मानसिक तौर पर डराने के लिए सजा का प्रावधान भी ठीक है लेकिन प्रदर्शनकारी जब उग्र हो जाते हैं तो वे किसी गोली की परवाह नहीं करते। ऐसे में वे किसी संभावित सजा से डरेंगे, मुझे ऐसा नहीं लगता।
जम्मू-कश्मीर में प्रदर्शनकारियों विशेष तौर पर पत्थरबाजों के विरुद्ध लाया गया नया अध्यादेश सार्वजनिक व निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने से रोकने के संदर्भ में है। यह राज्य सरकार का अध्यादेश है और जो केंद्र सरकार द्वारा राज्य के नेताओं से पुन: बातचीत शुरू करने के प्रयासों के विपरीत संकेत देता है। इसी आधार पर मेरा मानना है कि इस अध्यादेश का समय बहुत ही गलत है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने नाराज कश्मीरी जनता से बातचीत का सिलसिला फिर से शुरू करने के उद्देश्य से इंटेलीजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकार नियुक्त किया है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि केंद्र सरकार को दो-तीन साल में यह समझ में आया है, दबाव की रणनीति कारगर नहीं होगी।
किसी भी आंदोलन या प्रदर्शन की आवाज को गोली से नहीं दबाया जा सकता। समाधान तो बोली से ही निकलेगा। हालांकि दिनेश्वर शर्मा को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलेगा लेकिन उनके क्या अधिकार होंगे, उनकी बातचीत का महत्व कितना होगा, यह स्पष्ट नहीं है। पूर्व में भी इस तरह के प्रयास हो चुके हैं। इन सारी बातों को छोड़ भी दें तो इतना जरूर माना जा सकता है कि बातचीत के लिए वार्ताकार की औपचारिक नियुक्ति के पीछे केंद्र सरकार स्थानीय लोगों को सकारात्मक संदेश देने का प्रयास कर रही है। लेकिन, लगभग इसके साथ ही राज्य सरकार ने विपरीत संकेत दिया कि प्रदर्शनकारियों या आंदोलनकारियों को छोड़ा नहीं जाएगा।
उनके प्रदर्शन के दौरान होने वाली सरकारी या निजी संपत्ति का हर्जाना वसूला जाएगा और कथित अपराधियों को तीन से पांच साल तक की सजा भी दी जा सकेगी। इस तरह डराकर तो बातचीत शायद संभव नहीं होगी। यह भी कहना होगा कि लोकतंत्र में सभी को विरोध व्यक्त करने का अधिकार है और इसमें किसी अन्य की भले ही वह सरकारी संपत्ति ही क्यों न हो, नुकसान नहीं पहुंचाने दिया जा सकता। रोकने के लिए या मानसिक तौर पर डराने के लिए सजा का प्रावधान भी ठीक है लेकिन प्रदर्शनकारी जब उग्र हो जाते हैं तो वे किसी गोली की परवाह नहीं करते। ऐसे में वे किसी संभावित सजा से डरेंगे, मुझे ऐसा नहीं लगता।
इसके अलावा प्रदर्शनकारी किसी निजी संपत्ति को शायद ही नुकसान पहुंचाते हों। एक बात यह भी है कि हम भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्या जैसे जघन्य अपराध में भी सजा नहीं दिला पाते। कारण यही रहता है कि भीड़ में पहचान का संकट रहता है। ऐसे में प्रदर्शनकारियों में से संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों की पहचान का संकट भी रहेगा। इस आधार पर मुझे लगता है कि अध्यादेश का होना एक अलग बात है लेकिन इसे हकीकत में लागू कर पाना बेहद कठिन है।
Published on:
29 Oct 2017 01:50 pm
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