
niti aayog
केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने १५ वें वित्त आयोग के गठन को अपनी मंजूरी दे दी है। अब अगले कुछ ही दिनों में केन्द्र सरकार इसके अध्यक्ष और चार अन्य सदस्यों के नामों की घोषणा कर देगी। आमतौर पर इसके अध्यक्ष या तो राजनेता होते हैं या फिर कोई अर्थशास्त्री। कई अवसरों पर नौकरशाहों को भी यह कुर्सी मिली है। कायदे से देखें तो वित्त आयोग का काम बहुत ही महत्वपूर्ण है। खासतौर से देश की अर्थव्यवस्था के लिहाज से। वित्त आयोग जो सिफारिशें करता है, पांच साल तक देश भर की सरकारें उन्हीं पर काम करती हैं। देखा जाए तो एक तरह से वह केन्द्र और राज्यों के वित्तीय सम्बन्धों की धुरी होता है।
योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग के गठन तथा वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद के परिदृश्य में नए वित्त आयोग का काम बहुत जिम्मेदारी का है। वैसे तो उसके काम करने का क्षेत्र और शर्तें भारत सरकार तय करती हैं। यह काफी कुछ परिभाषित-सा भी है। लेकिन बदलते समय के साथ इनमें बदलाव काफी जरूरी लगता है। आज से ६५ साल पहले जब वित्त आयोग ने कामकाज शुरू किया था तब देश के पास संसाधनों के नाम पर कुछ नहीं था। आज तो देश का गरीब से गरीब आदमी अर्थव्यवस्था में योगदान कर रहा है। ऐसे में यह जरूरी है कि, राजकोष की पाई-पाई देश के काम आए। भ्रष्टाचार में बहने से रुके।
यह स्पष्ट करना बहुत जरूरी है कि, कौन-सा क्षेत्र और योजनाएं केन्द्र सरकार के पैसे से चल रही हैं और कौन-सी राज्यों के। शहर और गांव की सरकारों को कहां से कितना पैसा मिल रहा है और वो खुद क्या जुटा रही हैं। पहले राज्य केन्द्र से अधिकाधिक मदद के लिए लड़ते थे। प्राकृतिक आपदाओं के नाम पर मदद की राजनीति खूब होती थी। अब वैसा ही हाल सांसद और विधायक निधियों का है। क्यों नहीं धनराशि के आवंटन की मदों का एकीकरण किया जाए।
एक ही काम को दस योजनाओं के तहत दस एजेंसियों से कराना बंद किया जाए जिसमें जनता के धन के अपव्यय की आशंकाएं खूब रहती हैं। अभी हम विकास की जिस राह पर हैं उसमें स्वयंसेवी संस्थाओं के नाम होने वाली पैसे की बड़ी लूट भी रुकनी चाहिए। इसीलिए यह जरूरी है कि नए वित्त आयोग के काम करने का तरीका भी नया हो।
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
