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इस विदेश नीति में न तो नीति और न ही दिशा

हमारी सरकार की ढुलमुल नीतियों का ही नतीजा है कि नेपाल, अब चीन से नजदीकियां बढ़ाता नजर आ रहा है।

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Sunil Sharma

Dec 31, 2017

PM narendra modi

pm narendra modi

- अनिल शास्त्री

दुनिया के दूसरे मुल्कों से संबंध बेहतर बनाने की बातें तो छोड़ दें हमारे पड़ोसी मुल्कों में वे देश भी अब दूरियां बनाते दिख रहे हैं जो कभी भारत की छाया में आगे बढऩे वाले देश माने जाते थे। सबसे बड़ा उदाहरण तो नेपाल का है।

लगता है कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्वकाल में हम ‘कन्फ्यूज्ड’ विदेश नीति अपना रहे हैं। खास तौर से साल २०१७ के दौर में दुनिया के दूसरे मुल्कों से संबंध बेहतर बनाने की बातें तो छोड़ दें हमारे पड़ोसी मुल्कों में वे देश भी अब दूरियां बनाते दिख रहे हैं जो कभी भारत की छाया में आगे बढऩे वाले देश माने जाते थे। सबसे बड़ा उदाहरण तो नेपाल का है। हमारी सरकार की ढुलमुल नीतियों का ही नतीजा है कि नेपाल, अब चीन से नजदीकियां बढ़ाता नजर आ रहा है।

मैं पिछले दिनों श्रीलंका गया था। मुझे वहां के बाजारों में चीनी उत्पादों की भरमार दिखी। भारतीय उत्पाद तो गिने-चुने ही नजर आए। यह बताता है कि श्रीलंका से भी भारत के आर्थिक संबंध बेहतर नहीं रहे हैं। छोटे से देश मालदीव पर भी अब भारत के बजाए श्रीलंका का प्रभाव दिख रहा है। रहा सवाल चीन का, एक ओर हमारे प्रधानमंत्री चीन की पहली यात्रा को खूब प्रचारित कर रहे थे कि किसी पहले राष्ट्राध्यक्ष के रूप में उनका चीन के राष्ट्रपति ने प्रोटोकॉल तोडक़र बीजिंग के बजाए झियान में स्वागत किया।

चीन के साथ घनिष्ठता का दावा करने के बावजूद वह हमें ही जब-तब आंखे दिखाता रहा है। यहां तक कि वह अरुणाचल प्रदेश तक को भारत का अंग मानने से इनकार करता है। भला हम फिर कैसे घनिष्ठ संबंधों का ढिंढोरा पीटते हैं? शुरू से ही हमारे शत्रु देश की पहचान रखते पाकिस्तान के मामले में तो हमारी विदेश नीति काफी असमंजस भरी रही। विदेश मंत्रालय वीजा देकर पाकिस्तानियों को भारत आमंत्रित करता है और दूसरी ओर पाक की कायराना हरकतों की वजह से हमारे जवान अपनी ही धरती पर शहीद हो रहे हैं। कभी सेना के नाम का इस्तेमाल कर सर्जिकल स्ट्राइक को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है तो कभी पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव के प्रयासों का प्रचार।

कुलभूषण जाधव के मामले में पाकिस्तान का रवैया सबके सामने हैं। हैरत की बात यह है कि पाकिस्तान की और से इस प्रकरण में जो सफाई दी जा रही है उसके प्रतिवाद में भी शिथिलता बरती जा रही है। दरअसल पाकिस्तान का असली चेहरा तो उसी वक्त सामने आ गया था जब हमारे प्रधानमंत्री देश को बताए बिना पाक के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बेटी के निकाह में चले गए और उनके लौटते ही पठानकोट हमले को अंजाम दे दिया गया। सही मायने में कन्फ्यूज करने वाली इस विदेश नीति के कारण ही हमारे मित्र देश भी दूर होते जा रहे हैं। अब मोदी की सरकार अमरीका से जिस तरह से नजदीकियां बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं उससे हो सकता है कि भारत का नाम अमरीका के सहयोगी देशों में लिया जाने लगे। वस्तुत: हमें ऐसी विदेश नीति चाहिए जिसका नतीजा निकले।