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सामयिक : शैक्षिक मूल्यांकन की नई राह

जिस भी वैकल्पिक तरीके का उपयोग किया जाए वह यह बताने में सक्षम होना चाहिए कि विद्यार्थी क्या और कितना जानता है?

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सामयिक : शैक्षिक मूल्यांकन की नई राह

सामयिक : शैक्षिक मूल्यांकन की नई राह

गिरीश्वर मिश्र, (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा)

हमारी परीक्षाओं के दो उद्देश्य होते हैं - सीखने की प्रगति के बारे में अध्यापकों, विद्यालय प्रशासन, राज्य बोर्ड, अभिभावक और विद्यार्थियों को सूचना देना तथा इनके आधार पर उच्च कक्षा में प्रवेश व अन्य अवसरों के बारे में निर्णय लेना। बोर्ड परीक्षाएं रद्द करने का फैसला प्रकरण का पटाक्षेप नहीं है, बल्कि यह विमर्श के लिए एक प्रस्थान बिन्दु सरीखा है। प्रचलित परीक्षा प्रणाली की सीमाओं और आज के हालात को देखते हुए हमें शैक्षिक मूल्यांकन के दूसरे तरीकों के बारे में सोचना होगा जिनमें लचीलापन तो हो लेकिन स्पष्ट और प्रामाणिक कसौटियों का आधार भी हो।

जिस भी वैकल्पिक तरीके का उपयोग किया जाए वह यह बताने में सक्षम होना चाहिए कि विद्यार्थी क्या और कितना जानता है? इस सवाल का जवाब सिर्फ उच्च कक्षा में प्रवेश के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि अध्यापक द्वारा प्रयुक्त शिक्षण विधियों, सीखने के संसाधनों की गुणवत्ता एवं भावी सुधार के लिए भी यह उपयोगी होगा। वैकल्पिक मूल्यांकन द्वारा शिक्षा की निरंतरता भी बनी रहनी चाहिए। पिछले एक साल में सीखने-सिखाने की स्कूली व्यवस्था चरमरा गई है। ऐसे में संसाधन अभाव के कारण सीखने के अवसरों से वंचित विद्यार्थियों को औपचारिक शिक्षा में कैसे बनाए रखा जाए? कैसे सहायता दी जाए? इन प्रश्नों पर भी विचार करना होगा।

बोर्ड परीक्षाओं के विकल्प को देखें तो सबसे सरल और कारगर उपाय ऑनलाइन परीक्षा का है। इसे कई देशों में अपनाया भी गया लेकिन इसके साथ समस्या यह है कि इसके लिए काफी बड़े पैमाने पर चुस्त तकनीकी व्यवस्था जरूरी होगी। दूसरे वैकल्पिक उपायों के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुली पुस्तक परीक्षा का प्रयोग किया गया है, जिसमें निर्धारित समय अवधि में ज्ञान के अनुप्रयोग वाले प्रश्नों के माध्यम से विद्यार्थी अपनी विश्लेषणात्मक क्षमता का परिचय देते हुए प्रश्नों का उत्तर लिखते हैं। एक चलन वर्षपर्यंत विद्यार्थियों द्वारा किए गए कार्य के आधार पर मूल्यांकन का है। इसके लिए जरूरी है कि हर विद्यालय में सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की व्यवस्था चल रही हो। समस्या समाधान की कुशलता, या सीखी हुई दक्षताओं का प्रदर्शन भी एक तरीका हो सकता है जिसमें लिखित परीक्षा की जगह विषय की पृष्ठभूमि पर केंद्रित कोई प्रोजेक्ट दिया जाए।

यदि संभव हो तो राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय शिक्षा संस्थान की तर्ज पर विद्यार्थियों की मांग के आधार पर परीक्षा का आयोजन किया जाए। विद्यार्थियों द्वारा साल भर दिए गए कार्य (असाइनमेंट)/प्रदत्त कार्य को इक_ा कर आंतरिक और बाह्य परीक्षक के द्वारा मूल्यांकन की भी एक वैकल्पिक व्यवस्था हो सकती है। जो भी हो अब हमारे पास मूल्यांकन के लिए आंकड़े और उनके स्रोत बदल जाएंगे। वार्षिक परीक्षा में प्रश्नों के उत्तरों के स्थान पर समान वैकल्पिक स्रोतों की पहचान करनी होगी। यह भी ध्यान रखना होगा कि ऐसे बच्चे जिनके पास संसाधनों का अभाव है और जो निर्धारित पाठ्यचर्या को ठीक से नहीं पढ़ और समझ पाए, उनका आकलन कैसे होगा?