
उनके अपने ही प्रश्न के उत्तर में मन में अत्रि के शब्द गूंजे: 'ये व्यपेता: स्वधर्मेभ्य पर धर्मे व्यवस्थिता:।
तेषां शास्तिकरो राजा स्वर्गलोके महीयते।।
ठीक कह रहे थे अत्रि... जो अपने धर्म का पालन नहीं करते और परधर्म में तत्पर हैं, उनको दंडित करने वाला राजा, स्वर्ग लोक में पूजा जाता है। तो धर्मराज युधिष्ठिर ने इसी रूप में उन्हें दंडित किया है। वे अपना धर्म त्याग कर किसी और ही लोक में आ गए थे। यहां भय था, मोह था, तृष्णा थी, हिंसा थी और अहंकार था। वे स्वयं को इस संसार का अंग मानने लगे थे। पर यह तो उनका संसार नहीं था। ये ब्राह्मण के लक्षण नहीं थे। उन्होंने अपनी शिक्षा के आरंभिक दिनों में अत्रि ऋषि के शब्दों को पढ़ा था:
'शौचं मंगलमायासंअनसूयाअस्पृहा दम:। लक्षणानि च विप्रस्य तथा दानं दयापि च।।
हां! ब्राह्मण के लक्षण ये नहीं थे कि वह राजा का तिरस्कार सहता हुआ, अपने मोह में सेनाओं का संचालन करे और ईश्वर के बनाए हुए जीवों की निरीह हत्या करे। ब्राह्मण के गुण हैं... पवित्रता, मंगल, परिश्रम, अन्य लोगों के गुणों में छिद्र न ढूंढना, कामना न करना, इंद्रियों को विषयों से रोकना, दान देना और दया। पर द्रोण ने तो कहीं भी दया नहीं दिखाई। अपने प्रिय शिष्यों के साथ होते हुए अन्याय को केवल इसलिए सहन करते रहे, क्योंकि उससे वे अपना स्वार्थ साध सकेंगे।
फिर समरभूमि में आ खड़े हुए और उन लोगों को दिव्यास्त्रों से मारा, जिन्हें दिव्यास्त्रों का तनिक भी ज्ञान नहीं था। पाप किया... पर क्या करते। हस्तिनापुर में रहकर तो यही संभव था। हस्तिनापुर में ही रहना क्यों आवश्यक था? सहसा उनके अंतर्यामी ने पूछा। तो और कहां रहता? वे बोले, कहीं तो आश्रय चाहिए ही था। वे मौन हो गए। अंतर्यामी भी मौन ही रहा। उनके प्रश्न के उत्तर में ऋषि हारीत बोले:
'कृष्णसारो मृगो यत्र स्वाभावेन प्रवत्र्तते।
तस्मिन् देशे वसेद्धर्म: सिद्धयति द्विजसत्तमा:।
ठीक तो कह रहे हैं हारीत!... ब्राह्मण को अपने धर्म का पालन करना है तो उसे हस्तिनापुर में रहने की आवश्यकता ही क्या है। ब्राह्मण वहां वास करे, जिस देश में कृष्णसार मृग सहज भाव से विचरण करे। जहां हिंसा न हो, उग्रता न हो, रजोगुण का बाहुल्य न हो। और द्रोण ने सदा वास किया शस्त्रों में। आज भी वे खड़े हैं, जहां चारों ओर हिंसा और हत्या है। क्रोध और घृणा है। तो वे कैसे आशा कर सकते हैं कि उन्हें धर्म प्राप्त होगा? पुण्य प्राप्त होगा?
ब्राह्मण तो ब्रह्म के मुख से उत्पन्न हुआ है। उसका उपकरण वाणी है, मां सरस्वती का वरदान। वह बिना कांटों का निरुपम खेत है। उसको उसी में कृषि करनी है। उसी में सब बीजों को बोना है, वही सब कामनाओं को पूर्ण करने वाली खेती है उसकी। पराशर ने कहा न: 'ब्राह्मणस्य मुखं क्षेत्रं निरुपममकंटकम्। वापयेत् सव्र्ववीजानि सा कृषि: सर्वकामिका।।8
नरेंद्र कोहली के प्रसिद्ध उपन्यास से
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