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रांझा ओ रांझा

आनंदपाल की तरह ही कई बड़े अधिकारियों को जानते हैं जो पुलिस के चंगुल से ऐसे गायब हैं जैसे गधे के सिर से सींग

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Shankar Sharma

Feb 21, 2016

Gulab chand kataria

Gulab chand kataria

इश्क में आदमी इतना झाबझोब हो जाता है कि उसे याद ही नहीं रहता कि वह दरअसल है क्या? हीर जब रांझा के प्रेम में सराबोर थी तो दिन-रात रांझा-रांझा करती रहती और धीरे-धीरे उसको लगने लगा कि वह खुद ही रांझा है। तभी उसने यह प्रेमगीत गाया- रांझा-रांझा करते मैं खुद रांझा हुई। इश्क में तो आदमी खुदा हो जाता है पर हमारी सहानुभूति पूरी तरह अपने गृहमंत्रीजी के साथ है।

एक दिन बातों ही बातों में उनके दिल का दर्द जुबान पर आ गया और वे अपने भाषण में बोल ही बैठे- भाइयों। आनंदपाल-आनंदपाल कहते-सुनते मैं खुद 'आनंदपाल' हो गया। आप सब जानते हैं कि आनंदपाल एक हिस्ट्रीशीटर बदमाश है जो अपने चालानी गार्डों को नशीली मिठाई खिला कर पुलिस के चंगुल से फरार हो गया और आज तक पुलिस की गिरफ्त में नहीं आया। अब यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि पुलिस उसे ढंग से नहीं ढूंढ रही है पर आनंदपाल की तरह ही कई ऐसे बड़े अधिकारियों जिनमें आईएएस और आईपीएस दोनों शामिल हैं, को जानते हैं जो पुलिस के चंगुल से ऐसे गायब हैं जैसे गधे के सिर से सींग और इन दोनों पर ही महिलाओं के साथ कुकृत्यों के आरोप हैं।

वैसे इस व्यवस्था में एक नहीं अनेकों गुमशुदा हैं। अब आपको अपने मन की बात बताएं। ईश्वर की मेहरबानी से हमारे सिर कोई आरोप नहीं है, हमारे हजारों दोस्त हैं, दर्जनों रिश्तेदार हैं। पचासों चेले-चेलियां हैं बावजूद हम चाहते हैं- ए दिल कहीं ऐसी जगह चल कर रहें, जहां कोई न हो। जहां न कोई खैरख्वाह हो, न ही कोई दुश्मन। न कोई अपना कहने वाला हो, न पराया मानने वाला। अलबत्ता वह जगह बियाबान न हो। वहां लोग जरूर हो लेकिन सब अजनबी हों। आप ऐसी जगह जाकर रहने की कल्पना कीजिए।

अजी कल्पना में ही मजा न आ जाए तो कहना। मंत्रीजी ने एक और बात कही कि देर सवेर भगोड़ा आनंदपाल पुलिस के चंगुल में आ ही जाएगा। अपराध शास्त्र में भी लिखा है कि कातिल एक न एक बार हत्या करने की जगह वापस जरूर जाता है और उसकी इसी मानसिकता को ध्यान में रख कर पुलिस उसे दबोच लेती है।

यही मानसिकता प्रेमियों की भी होती है। आप चाहे बूढ़े हो चुके हों लेकिन आपके दिल के किसी कोने में अपनी जवानी के पहले प्रेम को देखने की हुड़क जरूर उठती होगी। आपकी आप जाने पर हमें तो जरूर उठी थी और हम 'रांझा' की तरह अपनी 'हीर' को तलाशते-तलाशते चाक गिरेबां करते 'हीर' तक पहुंच भी गए लेकिन तब हम आसमान से जमीन पर आ गरे जब हमारी मोटी ताजी, भारी-भरकम हीर ने हमें अपने नातियों से मिला कर कहा- बच्चों। चलो मामाजी को नमस्ते कहो। सारा इश्क पानी-पानी हो गया। कहीं ऐसा न हो कि गृहमंत्रीजी को आनंदपाल 'नेता' बना हुआ मिले।
राही