
देश में आबादी जिस रफ्तार से बढ़ रही है उसी गति से पानी की मांग भी बढ़ रही है। 'घी ढुल्यां म्हारा की नीं जासी, पानी ढुल्यां म्हारो जी बळे।' इस राजस्थानी लोकोक्ति से जल की एक-एक बूंद का महत्त्व समझ में आता है। लेकिन चिंता की बात यह है कि जल की मांग के अनुरूप उपलब्धता घटती जा रही है। भूजल के अंधाधुंध दोहन के साथ-साथ दूसरे जल संसाधनों में जलप्रबंधन का अभाव जगजाहिर है। देश में एक ओर जहां अनावृष्टि के कारण बड़ा भू-भाग सूखा एवं अकाल की चपेट में रहता है, वहीं कई हिस्से अतिवृष्टि की वजह से बाढ़ की चपेट में आते रहे हैं। एक तथ्य यह भी है कि पृथ्वी का 71 प्रतिशत हिस्सा पानी से ढका हुआ है। लेकिन कुल उपलब्ध जल का 97 फीसदी भाग सागरों में है, जो खारा है। यह पानी न तो पीने के काम आ सकता है और न ही सिंचाई के। केवल 3 प्रतिशत पानी ही इस्तेमाल करने योग्य है। इसमें भी 2.4 प्रतिशत ग्लेशियरों में है। एक तरह से केवल 0.6 प्रतिशत जल ही नदियों, झीलों आदि में है।
भूजल कम होने के यों तो कई कारण हैं लेकिन बड़ी वजह यह है कि हमारे शहर अब कंकरीट के जंगल बनते जा रहें है। इससे न भूजल में गिरावट आ रही है। इससे कई स्थानों पर जमीन धंसने की खबरें भी आ रही हैं। राजस्थान में बीकानेर के लूणकरनसर के सहजरासर गांव में गत 15 अप्रेल को अचानक जमीन धंसने से 110 फीट गहरा और 200 फीट व्यास का गहरा गड्ढा बनने का समाचार सुर्खियों में रहा था। जम्मू-कश्मीर की चिनाब वैली के रामधन में भी जमीन धंसने की घटना सामने आई। यहां पिछले साल भर में जमीन धंसने के आधा दर्जन से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं।
भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने अपनी जांच रिपोर्ट मे अत्यधिक जल दोहन और कम बारिश होने के साथ ग्राउंड वाटर रिचार्ज नहीं होने को जमीन धंसने का अहम कारण बताया गया है। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बुतरस घाली ने भविष्यवाणी की थी कि ऐसे ही हालात रहे तो अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। वैश्विक जल संकट का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि दक्षिण अफ्रीका की राजधानी कैपटाउन को दुनिया का पहला जलविहीन शहर घोषित कर दिया गया है। बात हमारे देश की करें तो राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक सरीखे प्रदेशों में हमेशा ही जलसंकट रहता है। इस बार तो बेंगलूरु व चैन्नई में यह समस्या ज्यादा विकट हो गई है। सुखद खबर यह है कि आइआइटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने हाल ही में समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाने में एल.टी.टी.डी. तकनीक से पानी के डि-सेलिनेशन में सफलता हासिल की है।
हमारे प्रयास अपनी जगह हैं, लेकिन जलसंरक्षण का सवाल भी इसके साथ है। आखिर हम अपने उपलब्ध जल-संसाधनों को संरक्षित रखने और पानी के संतुलित उपयोग को लेकर गंभीर कब होंगे? यह गंभीरता इसलिए भी जरूरी है क्योंकि देश में भूमिगत जल स्रोतों से 70 प्रतिशत पानी हमारे किसान सिंचाई के लिए काम में लेते हैं। अपनी जरूरतों को पूरी करने की दौड़ में हम जाने-अनजाने तेजी से भूगर्भीय जल का दोहन करने में जुटे हैं। इससेभूजल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है, जबकि भूजल का रिचार्ज उस अनुपात में नहीं हो पा रहा। भू-क्षरण को कम करना हमारे हाथ में है।
यदि हम दोहन किए गए भूजल के बराबर की मात्रा को भी रिचार्ज कर दें या फिर जल का संयमित इस्तेमाल करे तो भू-क्षरण भी स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगा। चिंता इसी बात की है कि जरूरत के मुताबिक भूजल का रिचार्ज नहीं करने से जमीन धंसने जैसी घटनाएं सामने आने लगी है। बात राजस्थान की करें तो यहां भूमिगत जल के पुनर्भरण के मुकाबले जल दोहन की मात्रा डेढ़ गुणा से ज्यादा है। हालात इतने भयावह है कि प्रदेश में मौजूद 301 ब्लॉक में से 295 ब्लॉक डार्क जोन में हैं।
पत्रिका की ओर से चलाए जा रहे अमृतम जलम् जैसे अभियानों को गति देने के साथ-साथ बड़े भूखण्डों एवं भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की अनिवार्यता को सख्ती से लागू कराना होगा। वैसे भी जल का किफायती उपयोग हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। आज भी शेखावाटी क्षेत्र के हर गांव में दानदाताओं द्वारा बनाये गये कुएं, बावड़ी व जोहड़ों के अवशेष देखने को मिलते है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में पूरी दुनिया के लिए जल संकट एक गंभीर चुनौती है। जल संरक्षण के प्रयासों को गति देने और भूजल दोहन की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए ठोस प्रयासों की जरूरत है। जल संकट का आए दिन सामना करने वाले प्रदेशों में प्रभावी जल प्रबंधन करना होगा। भावी पीढिय़ों को सुरक्षित करने के लिए भू-गर्भ आधारित पानी पर निर्भरता कम कर परंपरागत जल स्रोतों को संरक्षित करने और पुनर्जीवित करने की दिशा में काम करना होगा।
— राजेन्द्र राठौड़, पूर्व नेता प्रतिपक्ष, राजस्थान विधानसभा
Updated on:
20 May 2024 03:44 pm
Published on:
20 May 2024 03:40 pm
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