
हमारे छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े उपहार हैं पृथ्वी माता के लिए
डॉ. विवेक एस. अग्रवाल
संचार और शहरी
स्वास्थ्य विशेषज्ञ
मा तृ देवो भव। अर्थात माता देवों के समान वंदनीय है। प्रकृति भी मातृत्व के गुणों से परिपूर्ण है। मातृ वंदना का उल्लेख तैत्तिरीय उपनिषद में किया गया है। अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी माता दिवस के अवसर पर इसका स्मरण करना तथा इसके संरक्षण की दिशा में सार्थक प्रयास करने का संकल्प लेना आवश्यक हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने २००९ में प्रति वर्ष 22 अप्रेल को पृथ्वी दिवस के रूप में मनाने का संकल्प पारित किया गया था, जो सन् २०२० तक अनवरत, उसी रूप में चलता रहा, जिसके तहत संकल्प साधना, पृथ्वी काल इत्यादि की पालना की जाती रही।
हमारा जीवन माता के बिना असंभव है। यही बात पृथ्वी के अस्तित्व और हमारे भविष्य पर भी लागू होती है। अत: पृथ्वी दिवस को यदि पृथ्वी माता दिवस के रूप में मनाया जाता है, तो इसे आमजन और जनमानस से जोडऩा सरल होगा। भाषा कोई भी हो, लेकिन माता का अर्थ जीवनदायिनी ही होता है। अत: वर्ष २०२० से पृथ्वी दिवस को 'अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी माता दिवसÓ या 'अंतरराष्ट्रीय मदर अर्थ डेÓ के रूप में मनाया जाने लगा है। इस दिन अनेकानेक आयोजन होंगे, प्रतिज्ञाएं की जाएंगी और अगले वर्ष के प्रस्ताव का अनुमोदन होगा। एक घंटे के लिए बिजली बंद करने का आह्वान होगा। लेकिन, अगले ही पल अधिसंख्य जन वही बर्बादी, वही उपभोक्तावाद और लापरवाह जीवन शैली के साथ अपने जीवन चक्र को आगे बढ़ाने लगेंगे।
वर्तमान में पृथ्वी के प्रति चिंता और समाधान की आवश्यकता अत्यंत प्रबल हो गई है। असल में उपभोक्तावाद के चलते हर वर्ष डेनमार्क के क्षेत्रफल से अधिक यानी ४७ लाख हेक्टेयर वन समाप्त हो जाते हैं। इसमें से १७ लाख हेक्टेयर अकेले ब्राजील में तथा लगभग ७ लाख हेक्टेयर इण्डोनेशिया में समाप्त हो जाते हंै, यह गहन चिंता का विषय है। वर्तमान में उपभोक्ता संस्कृति के चलते पृथ्वी एवं प्रदत्त प्रकृति का दोहन बिना सोच-समझ के किया जा रहा है। इससे पैदा हो रही समस्याओं पर समग्रता से ध्यान देने की बजाय समस्याओं को अलग-अलग देखा जा रहा है। जैसे वर्तमान में प्लास्टिक की ओर ध्यान केन्द्रित है, जबकि उस पर प्रतिबंध के चलते कागज के लिए निर्बाध रूप से वनोन्मूलन गतिविधियां चली जा रही हंै। बढ़ती पैकेजिंग सामग्री, बढ़ती किताबों का बोझ, दिखावा सामग्रियां के उत्पादन के लिए वनों की कटाई तेजी से हो रही है। पाश्चात्य सभ्यता से अभिभूत एवं प्रेरित लोग भारतीय संस्कृति और सभ्यता को नेपथ्य में धकेल रहे हैं। पृथ्वी को माता का स्वरूप मानते हुए हर रीति-रिवाज में पृथ्वी के मानव पर ऋण का स्मरण कराया जाता है तथा उसे पूज्य माना जाता है। इसके मूल में यह संस्कार देने का प्रयास किया जाता है कि यह दोहन या उपयोग की वस्तु न होकर स्मरण, स्तुति और सततता के लिए हमारे मनोभाव में रहनी चाहिए। यह मात्र मानव नहीं अपितु हर जीव की पोषक है। इसके वन, फेफड़े हैं, जिनको नुकसान पहुंचाने से जीवों एवं वनस्पतियों की लाखों प्रजातियां संकट में हंै, कई तो समािप्त के कगार पर हंै। इन वनों से ही पृथ्वी माता हमें विकृति, विपत्ति एवं विषाणुओं से बचाने का आवरण प्रदान करती है। वनों की कटाई से सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है और सभी प्राणी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
पृथ्वी दिवस के अवसर पर हमें यह संकल्प करना होगा कि पृथ्वी माता कहने को ही माता नहीं है। आवश्यकता है हमारे मन-मानस में पृथ्वी के माता रूप में स्थापित करने की। कुछ छोटे प्रयास, हमारी पृथ्वी माता के क्षरण को रोक सकते हैं, जिनका अंततोगत्वा लाभ हमें ही होगा। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी माता दिवस का आयोजन अपने ग्रह यानी पृथ्वी में निवेश के ध्येय वाक्य के साथ किया जा रहा है। पृथ्वी का संरक्षण हमारा सबसे बड़ा निवेश होगा। इसके तहत सर्वप्रथम हमें स्थानीय सामग्री अपनाने पर जोर देना होगा, इससे प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी आएगी और माता पृथ्वी की सेवा होगी।
साथ ही ऊर्जा की बचत, अपशिष्ट की कमी, इलेक्ट्रॉनिक पदार्थों के पुन: चक्रीकरण, लोक परिवहन के उपयोग, स्वयं के परिवहन के तर्कसंगत उपयोग और बिजली के सही बल्ब का प्रयोग करना जरूरी है। नल से अनावश्यक रूप से पानी न बहने दें, अपना थैला साथ रखें, स्थानीय सामग्री खरीदने पर जोर दें और स्थानीय गतिविधियों को बढ़ावा दें। इस तरह के कुछ छोटे-छोटे प्रयास हैं, जिनका प्रभाव दूरगामी होता है। बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है। हमारा छोटा सा योगदान भी पृथ्वी माता के प्रति सम्मान और उपहार है। इन उपहारों को पृथ्वी माता को भेंट करने से हमें आशीर्वाद में स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण प्राप्त होगा।
Published on:
23 Apr 2023 09:23 pm
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