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- अश्वनि कबीर, सामाजिक कार्यकर्ता
घुमंतू जनजातियों में नट, भाट, कालबेलिया, बंजारे, भोपा, गाडिय़ा लोहार, कंजर और अन्य जनजातियां शामिल हैं। इनमें अधिकांश तो ऐसी हैं जो जीवन भर घुमंतू रहते हैं। अपनी रोजी-रोटी की तलाश में, हमारी समृद्ध परंपराओं और जीवन प्रसंगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाने तथा लोगों का मनोरंजन करने के लिए इन जातियों के लोग परिवार समेत अलग-अलग स्थानों पर घूमते रहते हैं। कभी-कभी हम सोचते हैं कि भला उनके लिए स्कूल, अस्पताल, आंगनबाड़ी का क्या मतलब?
पिछले कई वर्षों में राजस्थान में घुमंतू जनजातियों का पारंपरिक काम-धंधा जैसे-जैसे समाप्त होता गया है, वैसे-वैसे ये स्थायी रूप से एक स्थान पर रहने लगे हैं। वे काम के लिए वहीं आठ- दस किलोमीटर दूर मजदूरी करते हैं, अपना बनाया सामान बेचते हैं या खेल-तमाशा करते हैं। मध्यप्रदेश, बिहार और झारखंड प्रदेशों में भी इनकी स्थिति कमोबेश राजस्थान जैसी ही है। सरकार और कुछ एनजीओ के दावों से तो ऐसा लगता है कि अब तक घुमंतू जीवन बिता रहे इन परिवारों को खासी सुविधाएं हासिल हो गई हैं। इन दावों की पड़ताल करेंगे तो सरकारें कठघरे में खड़ी दिखेंगी। हम अक्सर नक्सलवाद का जिक्र करते हैं। किसी के नक्सली बनने के कारणों की पड़ताल करते हैं तो अभाव, सुविधाओं से वंचित रहना और शोषण को बड़ा कारण पाते हैं। कई घुमंतू जनजातियों की कोई सुध लेने वाला नहीं।
सवाल यह है कि इज्जत और सम्मान की जिंदगी पर तो सभी का हक है फिर घुमंतू जनजातियों को इनसे वंचित क्यों रखा जा रहा है? कहीं विकास के नाम पर इनके अस्थाई घरौंदों को तबाह कर दिया जाता है तो कहीं बच्चों को स्कूल तक नसीब नहीं हो पाता। किसी के पास जाति प्रमाण पत्र नहीं है, तो किसी के पास राशनकार्ड। भामाशाह कार्ड ही नहीं बना तो सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज कैसे हो? विधवा व वृद्धावस्था पेंशन कहां जाती है, किसी को पता नहीं। घुमन्तू जनजातियां तो मूलत: लोक कलाओं की समृद्ध परंपराओं की पोषक रही हैं।
अगर लोक कला के संरक्षण के नाम पर होने वाले खर्च को इन्ही घुमन्तू जनजातियों के लोगों को बचा लिया जाए तो लोक कलाएं तो अपने आप बच जाएंगी। हालत यह है कि जो लोग हमारे इतिहास और समृद्ध परंपरा को पीढिय़ों-दर-पीढिय़ों पहुंचाते रहे हैं उस मौखिक इतिहास के पालक ही आज इतिहास से बाहर किए जा रहे हैं।

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