
पहलगाम की बैसरन घाटी में निहत्थे पर्यटकों पर हुआ आतंकी हमला क्रूरता, बेरहमी और बर्बरता की पराकाष्ठा है। पाकिस्तान की इस हरकत पर पूरा देश उबल रहा है। नागरिकों का खून खोल रहा है। हर देशवासी चाहता है कि जिस किसी न यह कायराना दुष्कृत्य किया है, उसे ऐसी सजा मिले कि दुनिया के किसी भी कोने से भारत के खिलाफ साजिश करने वालों की रूह कांप उठे।
अब सवाल है कि भारत क्या कर सकता है? उरी और पुलवामा के बाद सर्जिकल व एयर स्ट्राइक हम कर चुके। लेकिन पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आया। तब क्या पाकिस्तान को सर्जिकल व एयर स्ट्राइक से भी कुछ बड़ा सबक दिए जाने की जरूरत है। गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और पीएमओ में जिस तरह से बैठकों का दौर चल रहा है, उससे जाहिर है 'कुछ' होगा जरूर। डिप्लोमेटिक रूप से तो भारत पाकिस्तान को आइसोलेट करने में कामयाब हो गया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित दुनिया की सभी बड़ी शक्तियां इस वक्त भारत के साथ खड़ी दिख रही हैं। यूएनएससी ने तो हत्याओं के जिम्मेदारों को जवाबदेह ठहराने के लिए सभी देशों से अपील की है कि वह अपने-अपने स्तर पर इस मसले पर सहयोग करे। सवाल यह है कि क्या भारत इस अंतरराष्ट्रीय पेशबंदी का लाभ उठा सकेगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि पाकिस्तान की परमाणु बम के प्रयोग की धमकी (जो वह अक्सर देता रहता है) हमारे इरादों को कमजोर कर दे।
सच तो यह है कि यह वक्त छोटी-बड़ी डिप्लोमेटिक कार्रवाई का नहीं, पाकिस्तान की 'जुगुलर वेन' को दबाने का है। हालांकि, भारत ने दुनिया में हमेशा शांति का पैगाम दिया है। प्रधानमंत्री मोदी भी कह चुके हैं 'यह युद्ध नहीं, बुद्ध का देश है।' लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हम जितना सहन कर सकते थे, उससे कहीं अधिक सहन कर चुके हैं। जब तक नियंत्रण रेखा के दूसरी तरफ खून नहीं बहेगा, स्थायी शांति संभव नहीं है। पाकिस्तान के मर्म (सेना) पर चोट करेंगे तभी उसका परमानेंट इलाज हो सकेगा। इस वक्त पाकिस्तान देश के भीतर कई मोर्चों पर घिरा हुआ है। वह आर्थिक व राजनीतिक अस्थिरता के सबसे बुरे दौर में है। उसकी इकोनॉमी आईसीयू में है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा स्वीकृत 7 बिलियन डॉलर के बेलआउट सौदे पर भी संकट मंडरा रहा है। महंगाई, भ्रष्टाचार, कमजोर अर्थव्यवस्था और खाली खजाने के कारण वह जंग में ज्यादा देर तक टिक नहीं सकेगा और आर्थिक रूप से खोखला पाकिस्तान शुरुआती झटकों में ही भरभरा कर ढह जाएगा।
बलूच अलगाववादी आंदोलन उसके लिए अस्तित्वगत खतरा बन गया है। इस साल मार्च में जाफर एक्सप्रेस के हाईजैक के बाद बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) के हौंसले सातवें आसमान पर है। पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार कर बीएलए ने स्पष्ट तौर पर पाक सरकार को चेता दिया है कि स्वतंत्र बलूचिस्तान की मांग को बलपूर्वक दबाना मुश्किल है। खैबर पख्तूनख्वा में भी अस्थिरता है। यहां तहरीक-ए-तालिबान पाक आर्मी के लिए चुनौती बना हुआ है। भारत को अपनी ग्रे जोन युद्ध (हाइब्रिड युद्ध) क्षमता बढ़ानी होगी। यानि सैन्य कार्रवाइयों से इतर दुश्मन को अलग-अलग मोर्चों पर कमजोर करने की नीति अपनानी होगी। खासकर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और बलूचिस्तान में भारत समर्थक कई लोग होंगे, जो हमारा साथ दे सकते हैं। पाकिस्तान को चोट पहुंचाने के लिए रणनीतिक रूप से भारत को ऐसा करना ही होगा।
इसके अलावा पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क को दुनिया के कई हिस्सों से फंडिंग मिलती है। आतंक के इस स्रोत को भी बंद करना होगा। पंजाब में आतंकवाद का फन भी तभी कुचला जा सका था जब स्थानीय लोग उठ खड़े हुए थे। बलूच और खैबर पख्तूनवाह के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर भी आंतरिक संघर्ष है। इमरान खान की पार्टी लगातार सरकार और सेना को चुनौती दे रही है। पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में इस समय डर व भय का माहौल है, भारत को इसका लाभ मिल सकता है। सैन्य मोर्चे पर भी पाकिस्तान के हालात काफी खस्ता है। सेना पाक अवाम का भरोसा खो चुकी है। पिछले दिनों लीक हुई एक चिट्ठी में सेना के कई अधिकारियों ने सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर पर अक्षमता, भ्रष्टाचार और राजनीतिक उत्पीडऩ के गंभीर आरोप लगाए जिससे सेना के भीतर बगावत की आशंका उजागर हुई। सेना के कई बड़े अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। पनामा पेपर्स और ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट की रिपोर्ट में कई जनरलों के स्विस बैंक खातों का खुलासा हुआ।
अधिकारियों पर आरोप है कि वे राष्ट्र की सुरक्षा पर ध्यान देने की बजाय राजनीति, रियल एस्टेट और दूसरे व्यावसायिक कार्यों में रुचि ले रहे हैं। सबसे अहम यह कि पाक सेना की फिटनेस में जबरदस्त कमी आई है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सेना की कमजोरी पहले ही उजागर हो चुकी है। मीडिया रिपोट्र्स की मानें तो देश के भीतर सेना प्रमुख असीम मुनीर के खिलाफ लोगों में आक्रोश भड़क रहा है। लोग मुनीर के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। अफगान सीमा पर भी पाकिस्तान तालिबान से उलझा हुआ है। भू-रणनीतिक स्थिति भी इस समय भारत के पक्ष में है। हालांकि, आज के बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में पाकिस्तान की संभावित प्रतिक्रिया का सही आकलन किए बिना किसी भी कदम को उठाना जोखिम भरा भी हो सकता है। लेकिन यह भी सही है कि लॉन्ग टर्म सॉल्यूशन का इससे बेहतर समय और नहीं हो सकता।
Published on:
29 Apr 2025 01:54 pm
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