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पंचायती राज प्रणाली : पुनर्गठन की आवश्यकता

पंचायती राज प्रणाली में कुछ सांगठनिक एवं संरचनात्मक खामियां महसूस की जा रही हैं। समय रहते निराकरण से इसे प्रभावशाली रूप दिया जा सकेगा।जिला आयोजना व विकास परिषद का गठन कई राज्यों की पूर्ववर्ती पंचायती राज प्रणाली में शामिल रहे प्रावधान के अनुरूप किया जाना चाहिए।

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पंचायती राज प्रणाली : पुनर्गठन की आवश्यकता

पंचायती राज प्रणाली : पुनर्गठन की आवश्यकता

राजेश्वर सिंह

संविधान के 73वें व 74वें संशोधन के बाद पंचायती राज प्रणाली को प्रभावी तरीके से लागू किया गया, जो लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की दिशा में अहम व आवश्यक कदम था। लेकिन इस दौरान कुछ सांगठनिक एवं संरचनात्मक खामियां महसूस की गई हैं, जिनका समय रहते निराकरण जरूरी है ताकि इसे और सुसंगठित, सुव्यवस्थित तथा प्रभावशाली रूप दिया जा सके।

पंचायत समिति व जिला परिषद के सदस्यों का प्रत्यक्ष निर्वाचन वर्तमान प्रणाली की अहम खामी कही जा सकती है। पूर्ववर्ती व्यवस्था में सरपंच, पंचायत समिति के और प्रधान, जिला परिषद के पदेन सदस्य होते थे तथा कुछ सदस्यों को इनके द्वारा सहयोजित किया जाता था। वर्तमान व्यवस्था में प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों को न तो कोई विशिष्ट दायित्व सौंपा हुआ है और न ही कोई क्षेत्र विकास निधि आवंटित है। अत: संबंधित निकाय की बैठकों में भाग लेने के अलावा इनके पास कोई विशेष कार्य नहीं है। चूंकि ग्राम पंचायत, पंचायत समिति व जिला परिषद पारस्परिक रूप से अंतरसंबंधित संस्थाएं हैं, अत: आवश्यक है कि पूर्ववर्ती व्यवस्था को बहाल किया जाए। जिले के सांसद-विधायकों को भी उक्त संस्थाओं में पदेन या स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया जाए। उक्त के अतिरिक्त हर ग्राम पंचायत एक सदस्य पंचायत समिति के लिए तथा हर पंचायत समिति एक सदस्य जिला परिषद के लिए निर्वाचित करे, जिसमें से प्रधान, उप प्रधान तथा प्रमुख, उप प्रमुख को निर्वाचित किया जाए।

इसी प्रकार स्थायी समितियों की वर्तमान संरचना तथा सक्रियता संतोषप्रद नहीं है। प्रशासन, वित्त एवं कराधान, शिक्षा, चिकित्सा एवं समाज कल्याण, कृषि, पशुपालन एवं ग्रामोद्योग, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तथा अवसंरचना विकास से संबंधित कुल 5 स्थायी समितियां होनी चाहिए। प्रत्येक में संयोजक व सह संयोजक के अलावा 5 सदस्य हों तथा पंचायती राज संस्था के हर सदस्य के लिए न्यूनतम एक स्थायी समिति का सदस्य होना अनिवार्य हो। वर्तमान प्रणाली की एक अन्य खामी जिला परिषद को छोड़कर अन्य पंचायती राज संस्थाओं का समय-समय पर पुनर्गठन व पुनर्सीमांकन है। इससे ग्रामीण क्षेत्र में जातीय व साम्प्रदायिक आधार पर अनावश्यक प्रतिस्पर्धा, तनाव व मतभेद के अलावा प्रशासनिक इकाइयों जैसे उपखण्ड, तहसील, पुलिस थाना इत्यादि से समन्वय की समस्या पैदा होती है। अत: जैसा कि पंचायती राज अधिनियम में हर राजस्व जिले के लिए जिला परिषद का प्रावधान है, वैसे ही हर तहसील के लिए पंचायत समिति व हर पटवार मण्डल के लिए ग्राम पंचायत का प्रावधान होना चाहिए।

74वें संविधान संशोधन के द्वारा जिला आयोजना समिति के गठन का प्रावधान किया गया, जिसके सदस्यों का चुनाव जिला परिषद व जिले के नगरीय निकायों के सदस्यों द्वारा अपने में से ग्रामीण व शहरी जनसंख्या के अनुपात में किया जाता है। उक्त समिति वर्तमान में पर्याप्त रूप से क्रियाशील नहीं है। अत: इसके स्थान पर, जैसा कि कई राज्यों की पूर्ववर्ती पंचायती राज प्रणाली में प्रावधान था, जिला आयोजना व विकास परिषद का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें जिले के हर स्तर के जनप्रतिनिधि सम्मिलित हों, जिले के प्रभारी मंत्री उक्त परिषद के अध्यक्ष हों एवं जिला कलक्टर, सदस्य सचिव हों।

(राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव, ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज रहे हैं)