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पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख: दमकते चेहरे पर कालिख

न्यायपालिका को साधुवाद! आखिर किसी ने तो सुनी इंदौर की पीड़ा। विधायिका और कार्यपालिका तो लीपा-पोती में जुटे हुए थे।

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indore water

फोटो: पत्रिका

न्यायपालिका को साधुवाद! आखिर किसी ने तो सुनी इंदौर की पीड़ा। विधायिका और कार्यपालिका तो लीपा-पोती में जुटे हुए थे। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने दूषित जल मामले में जिस तरह अफसरों को आड़े हाथों लिया है, उसने निश्चित ही प्रदेश की इस ‘वाणिज्यिक’ राजधानी के घावों पर मल्हम लगाने का काम किया है। अच्छा होता विधायिका के जिम्मेदारों की खबर भी ली जाती। अपने जनप्रतिनिधियों के मौन और अहंकार को शहर की जनता आसानी से भूल नहीं पाएगी।

इंदौर में दूषित जल पीने से मरने वालों की संख्या 18 तक पहुंच गई है। सौ से ज्यादा लोग अब भी अस्पताल में भर्ती हैं। रोज बीमार होकर अस्पताल पहुंचने वालों का सिलसिला थम नहीं रहा। दूसरी ओर, स्थानीय जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक गोटियां खेलने से फुर्सत नहीं है। दो-चार दौरे कर लिये। मृतकों के परिवारों से मिलकर मगरमच्छी आंसू बहा दिये। दो-चार अफसरों पर दिखावे की कार्रवाई कर दी। बस हो गई जिम्मेदारी पूरी !

इंदौर के एक कद्दावर नेता का अहंकार, जो जलदाय महकमे के कामकाज के लिए जिम्मेदार भी हैं, सिर चढक़र बोल रहा है। उनका व्यवहार लोकतंत्र के अनुकूल तो नहीं लगता। लगता है जनता को वह ‘प्रजा’ और स्वयं को ‘राजा’ समझते हैं। दुख की घड़ी में भी स्वयं सोफे पर बैठते हैं और पीडि़तों को जमीन पर बिठाते हैं। जनता के लिए दूषित जल और स्वयं के लिए ‘बिसलेरी’! स्वच्छ जल की आपूर्ति के लिए नगर निगम जिम्मेदार है, पर महापौर का कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि वे "राजा" के कृपा पात्र हैं।

स्वच्छता रैंकिंग में पिछले कई वर्षों से देशभर में सिरमौर रहने वाले इंदौर शहर के दमकते चेहरे पर नेताओं और अफसरों ने एक दिन में कालिख पोत दी। नैतिकता के नाम पर मंत्री के इस्तीफा देने वाले उदाहरणों को हंसी में उड़ा दिया जाता है। हां, सरकार दूसरी पार्टी की हो तो पूर्व मंत्री को जेल भेजने पर भी कोई नहीं हिचक नहीं होती। राजस्थान का जनजीवन मिशन घोटाला इसका प्रमाण है। फर्क यह है कि वहां सरकार बदलते ही घोटालों की जांच हो गई। इंदौर में घोटाला अभी पर्दे के पीछे छिपा हुआ है। सामने सिर्फ यह बात आई है कि पेयजल लाइनों की मरम्मत के लिए स्वीकृत हुए ‘टेंडर’ को महीनों तक दबाकर रखा गया था। क्यों, इसका जवाब सब जानते हैं। लोगों की मौतें भी "लालच" के सामने छोटी पड़ती हैं।

आश्चर्य तो तब होता है, जब असली अपराधियों पर कार्रवाई के नाम पर सबको सांप सूंघ जाता है। ना सरकार की प्रतिष्ठा की चिंता है, ना केन्द्रीय नेतृत्व की।

हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझा है-यह राहत की बात भी है और संतोष की भी। अदालत का यह कहना कि जिम्मेदारों की आपराधिक जिम्मेदारी तय की जाएगी- इंदौर की पीड़ित जनता को सांत्वना प्रदान करता है।

हालांकि विधायिका और कार्यपालिका पूरे मामले को रफा-दफा कर, दोषियों को ससम्मान बरी करने की तैयारी में जुटी लग रही हैं। ऐसे में उम्मीद न्यायपालिका से ही रहेगी कि वह इसी तरह के गंभीर मुद्दों पर कठोर निर्देश ना सिर्फ देती रहेगी, बल्कि उनकी पालना भी सुनिश्चित करती रहेगी, वरना कुछ प्यादों को शिकार बना राजे-महाराजे अपनी जीत पर यूं ही अट्टहास करते रहेंगे।

bhuwan.jain@epatrika.com