scriptकानून दिव्य दृष्टि से बनें | Patrika Group Editor In Chief Gulab Kothari Special Article 05 July 2024 Laws Should Be Made With Divine Vision | Patrika News
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कानून दिव्य दृष्टि से बनें

कुछ रोग पैदा होते हैं, कुछ पैदा किए जाते हैं तथा कुछ ऐसे रोग भी होते हैं जो सभ्यता-विकास के साथ आते हैं (किन्तु जाने का नाम नहीं लेते)। कुछ रोग व्यापार का रूप ले चुके हैं। कुछ मानसिक उद्वेलन से प्रकट होते हैं।

जयपुरJul 05, 2024 / 11:23 am

Gulab Kothari

गुलाब कोठारी

कुछ रोग पैदा होते हैं, कुछ पैदा किए जाते हैं तथा कुछ ऐसे रोग भी होते हैं जो सभ्यता-विकास के साथ आते हैं (किन्तु जाने का नाम नहीं लेते)। कुछ रोग व्यापार का रूप ले चुके हैं। कुछ मानसिक उद्वेलन से प्रकट होते हैं। कुछ चिकित्सा के साइड इफेक्ट्स से नए वेश में अभिव्यक्त होते हैं। कुछ रोग लाइलाज ही होते हैं। पिछले 15-20 वर्षों में इस रोग (कैंसर) ने जो ताण्डव रचा है उसने एक उद्योग का रूप ले लिया। अकेले कैंसर के अस्पताल खुल रहे हैं। रोगियों की मानों बाढ़ आ रही है। कीटनाशकों-फल/सब्जियों को पकाने के रसायनों ने इस रोग को घर-घर पहुंचा दिया है। व्यक्ति दोनों वक्त रोटी के साथ कैंसर भी खा रहा है। आदमी कितने भी मरे, सरकार तो उन्नत बीज-खाद और पैदावार बढ़ाने में लगी है। आबकारी नीति की तरह आदमी से ज्यादा आय महत्वपूर्ण है।
अब एक रोग उभर रहा है और तेज गति पकड़ने वाला है। यह है ‘मोबाइल का नशा’। हर सप्ताह एक-दो आत्महत्याएं राजस्थान में ही हो जाती है। पूरे देश पर दृष्टि डालो तो शिक्षा और विकास का एक नया वृक्ष या अमरबेल सुरसा के मुंह जैसी दिखाई पड़ जाएगी। पूर्व की संस्कृति को पश्चिम की संस्कृति से सिर के बल टक्कर लेनी पड़ रही है। वर्तमान शिक्षा पश्चिम के आवरण से पूर्व की विरासत को (विज्ञान के नाम से) ढंकती जा रही है। व्यक्ति, आत्मा के स्थान पर देह में जीने लगा। अपनी विज्ञान की परिभाषा और जीवनशैली को नकारता हुआ प्रकृति से छिटककर अपना आधार खोता जा रहा है। नई वैज्ञानिक परिभाषा का जीवन में प्रवेश हो गया है। भारतीय विज्ञान आत्मा से जोड़कर रखता है, पश्चिम के प्रयोगों में व्यक्ति नहीं उपकरण जुड़ते हैं। अत: परिणामों का सदुपयोग/दुरुपयोग दोनों ही संभव है। मानव स्वभाव से सुविधा की ओर भागता है। पानी की तरह ढलान की ओर बहता है। यहीं कैंसर बनता है। उपकरण इसको पकड़ नहीं पाते। आंकड़ों का उतार-चढ़ाव देखते रहते हैं।
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परिवारों में फंसे क्षत्रप

हर असाध्य रोग समय के साथ कैंसर के समुद्र में नदियों की तरह आकर समा जाता है। मोबाइल मेनिया पूर्व का कैंसर है, पश्चिम का नहीं। मोबाइल छोटी उम्र में बच्चों को- (1) उम्र से पहले बड़ा बनाता है। (2) यू-ट्यूब और फेसबुक पर यौनाचार की फिल्में दिखाता है। हमारा पोक्सो एक्ट यहां नपुंसक सिद्ध होता है। (3) जंक फूड, नशा और अनावश्यक विज्ञापनों के आक्रमण का बड़ा माध्यम है। (4) वीडियो गेम्स- सट्टा जैसे नशे की लत पैदा करता है। (5) शरीर को तरंगित करने वाला संगीत इस माहौल को रोमांचक बना देता है। हमारे अन्न ब्रह्म और नाद ब्रह्म की धज्जियां उड़ जाती है।
हम प्राकृतिक प्राणी है। जैसे पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, वैसे हम। शरीर मात्र भिन्न हैं। प्रत्येक शरीर ब्रह्माण्ड के समान कार्य करता है। हमारा आत्मा (जीव) चन्द्रमा से होकर, अन्न के माध्यम से शरीर में आता है। चन्द्रमास (28 दिन) के आधार पर ही पुरुष में बीज का स्वरूप बनता है। इसी आधार पर स्त्री शरीर में ऋतुकाल (मासिक) का संचालन होता है। लड़का चन्द्रमा की सोलह कलाओं के भोग के उपरान्त 16 वर्ष में पूर्ण वयस्क होता है। कन्या 4-6 वर्ष पूर्व (ऋतुकाल से) ही वयस्क हो जाती है। इस देश में विवाह की उम्र में इस काल का समावेश रहता था।
वयस्क होते समय शरीर में अनेक परिवर्तन होते हैं। विचारों में इन हार्मोन्स का प्रभाव अतिसंवेदनशील तरीके से पड़ता है। यह काल ब्रह्म के विस्तार का काल-निर्माण है। इसे कोई ज्ञान दबा नहीं पाया। लड़का/लड़की इस काल में भीतर एक उद्वेलन का अनुभव करता है। अकेले में मन स्वयं से बात करना चाहता है। भीतर खो जाना चाहता है। काम तंत्र भी विकसित हो रहा होता है। मोबाइल इन सभी पहलुओं को प्रज्जवलित करता है।
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मंशा का प्रत्युत्तर

त्रासदियों का सिलसिला

समय से पूर्व की परिपक्वता सम्पूर्ण समाज में परिलक्षित हो रही है। शिक्षा के दबाव ने नैतिक पूर्णता (विवाह) को नकार कर अनैतिक स्वच्छंदता का मार्ग प्रशस्त करना शुरू किया। समय की मांग-प्राकृतिक स्वरूप में-नकारी नहीं जाती। जीवन में त्रासदियों का सिलसिला यहीं से शुरू होता है।
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् (गीता 3/37)

रजोगुण से उत्पन्न यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला है।

क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति (गीता 2/63)
क्रोध से मूढ़ता-स्मृति भ्रम, बुद्धिनाश तथा व्यक्ति अपनी क्षमताओं से नियंत्रण खो बैठता है। यही आत्महत्या का उकसावा है। आज मोबाइल के संदर्भ में जो सिलसिला आत्महत्याओं का चल पड़ा है, वह मूलत: इसी आयु वर्ग का है। एक अवधारणा यह भी पाश्चात्य शिक्षा का अंग बनकर आई है कि शिक्षा काल में विवाह नहीं करना है। शरीर-बुद्धि-मन का संतुलन प्राकृतिक जीवन शैली से ही प्राप्त हो सकता है। क्या शादी के बाद पढ़ाई आगे नहीं बढ़ सकती? लिव-इन-रिलेशन, लव जिहाद, तलाक-बेमेल विवाह, स्तन/गर्भाशय के कैंसर, आईवीएफ की त्रासदी आदि से लगभग छुटकारा मिल जाता है।
देर से शादी की सजा केवल लड़कियों को ही मिलती है। विवाह-विच्छेद के बाद की त्रासदी, जीवन से अनावश्यक संघर्ष तथा परिजनों की कुदृष्टि का अभिशाप भौतिक विकास का उपहार है। मोबाइल फोन भावनाओं को अशान्त बनाए रखता है। ये सब कुछ ठोकर खाने के बाद ही समझ में आता है। ये पीड़ा मूलत: मध्यमवर्गीय, अर्द्ध शिक्षित, महत्वाकांक्षी समाज की सर्वाधिक है। विकसित देशों की ऐसी स्थिति है, किन्तु कष्टदायक इतनी नहीं है। समय पर शादी के अभाव में वहां भी नाबालिग/ अविवाहित माताओं की भरमार है, किन्तु सरकारें बहुत कुछ भार वहन कर लेती है। समाज में सम्मान पर आंच नहीं आती। पति बदलते रहने में असुविधा भी नहीं होती। हां, संतान पीछे छूट जाती है। जीवन शरीर प्रधान है। पितृ दिवस-मातृ दिवस से पेट भर जाता है।
मोबाइल-इंटरनेट-एआइ समय की अनिवार्यता है। तकनीक बदलती रहेगी। न प्रकृति के नियम बदलेंगे, न ही शरीर की संरचना। चारों युग साक्षी है। इसी में सुख से जीने का मार्ग हमें निकालना है। सरकारें अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए हम लोगों से दोगला व्यवहार करती है। दूषित अन्न पर सरकार की कमाई चल रही है। पोक्सो एक्ट का नाटक बड़ा उदाहरण बना हुआ है। बड़े लोगों पर आरोप-गिरफ्तारियां और यू-ट्यूब, फेसबुक पर अश्लील फिल्में चलाने की खुली छूट। मादक पदार्थों के विरुद्ध अभियान और शराब से आय बढ़ाने के अभियान। मद्यनिषेध का दृश्य देखो-घर-घर में अवैध सप्लाई। रासायनिक खाद के टारगेट-नए बीजों के उपयोग पर जोर आदि सारे आयोजन मृत्यु का द्वार खोलने वाले हैं।
अभी तो तत्काल सरकार को अश्लील-निषेधात्मक सामग्री के प्रसार पर पूर्णत: रोक लगा देनी चाहिए। चाहे कितनी भी असुविधा हो। जीवन को नरक बनाने से रोकना हर सरकार का पहला दायित्व है। बाकी सारी अवधारणाएं झूठीं निकलेंगी। इसी प्रकार शादी से जुड़े कानूनों को विकास से नहीं, शरीर के प्राकृतिक गठन/व्यवहार तथा भोग वृत्तियों के स्वरूप के संदर्भों में तय करना चाहिए। कन्या शरीर की दिव्यता/पूजनीयता ही देश की सम्पन्नता का एकमात्र रास्ता है। कहा भी है-
‘‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवता’’।

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